(I) जीवन ही शरीर को ‘जीवंत’ बनाये रखता है

मानव, जीवन और शरीर के संयुक्त साकार रूप में है। सम्पूर्ण शरीरों का जीवन्तता पूर्वक कार्य व्यवहार करना पाया जाता है। जीवन, शरीर को जीवंतता प्रदान करने का फल ही है। मानव परम्परा में जीवन जागृति प्रमाणित होता है। जीवन ही इंद्रियों का दृष्टा है। यह प्रत्येक मनुष्य में प्रमाणित है। यह प्रमाण परस्परता में भी प्रमाणित है। प्रत्येक मनुष्य जीवंतता पूर्वक जीता हुआ और निर्जीवन्तता पूर्वक, मरा हुआ शरीर के रूप में पहचाना जाता है, तदनुसार मनुष्य, निर्वाह भी करता है। जैसे जीवन, मनुष्य के जीते रहने के अधिकार को, परस्पर प्रकारान्तर से स्वीकारता है। यही जीने देने का प्रधान सूत्र है। जीता हुआ आदमी जीना चाहता ही है। जीवित आदमी को देखने वाला आदमी भी, जीवित रहता है। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य जीवंतता पूर्वक, जीवित मनुष्य को सहज ही पहचानता है। यह कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों में परावर्तित जीवन का वैभव है। यह परावर्तन विधि, सह-अस्तित्व सहज है। समृद्घ मेधस युक्त रचना के उपरान्त ही (अथवा समृद्घ मेधस युक्त शरीर को) जीवन, सहज ही जीवन्तता प्रदान करता है। जीवंतता प्रदान करने की प्रक्रिया यह है कि जीवन अपने जीने की आशा सहज प्रभाव से, मेधस को प्रभावित करता है।

मेधस के द्वारा ज्ञानवाही विधि से, सम्पूर्ण शरीर में जीवंतता का प्रभाव क्षेत्र बना ही रहता है। मेधस पर जीवन का, संकेतों के रूप में जो प्रभाव प्रभावित रहता है, वही सर्वाधिक पांचों ज्ञानेन्द्रियों द्वारा, कार्यशील प्रवर्तनशील देखने को मिलता है। जीवन अपने में गठन पूर्ण परमाणु है, चैतन्य पद में संक्रमित इकाई है। यही जीवन प्रतिष्ठा के रूप में वैभवित है। जागृति पूर्वक जीवन अपने दृष्टा पद का प्रयोग करता है और अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन करता हुआ, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों का दृष्टा है। यही शरीर के साथ संज्ञानशीलता का भी तात्पर्य है। इच्छानुसार इंद्रिय कार्य करना ही इन्द्रिय व्यापार है। (अथवा इंद्रिय कार्यकलाप है)। – म.वि. 245

प्राण कोशाओं से कर्मन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों समेत रचना सम्पन्न होने के उपरान्त, जीवन्तता की आवश्यकता शेष रहती है। दूसरी ओर जीवन, चैतन्य पद में होते हुए भी, उसको जागृति की आवश्यकता रहती है। जागृति और जागृति पूर्ण परम्परा का सहज क्रम में, मानव परम्परा ही सर्वोपरी व उपयुक्त है। - म.वि. 66

जीवन और शरीर की संयुक्त परम्परा में ज्ञानेन्द्रियों का कार्य सम्पन्न होना सहज है। कर्मेन्द्रियों का आरंभिक क्रिया-कलाप (अथवा सामान्य लक्षण) प्राणावस्था में भी सम्पन्न होता है। ज्ञानेन्द्रियों का कार्य-कलाप, जीवन्तता पूर्वक ही, सम्पन्न हो पाता है। जीवन के योग में ही, शरीर में जीवन्तता का प्रमाण वर्तमान है। इस क्रम में अंग और अवयवों के रूप में रचित, शरीर रचनाओं में से, मेधस भी एक प्रधान रचना रूपी अवयव और तंत्र है। यह अवयव सर्वाधिक, शरीर रचना के शिरोभाग में होना, देखा जाता है। इन्हीं मेधस पर, जीवन सहज आशा, विचार, इच्छा, संकल्प, अनुभवों और प्रामाणिकताओं को प्रमाणित करना, मनुष्य परम्परा में स्पष्ट है। इस विधि से प्रत्येक मनुष्य जीवन व शरीर के, संयुक्त रूप में, कार्यरत रहते हुए जानने, मानने, पहचानने व निर्वाह करने का क्रिया- कलाप, मानव सहज रूप में प्रमाणित होता है। - म.वि. 145

शरीर संवेदना के क्रिया-कलाप, जीवंतता के आधार पर ही पांचों ज्ञानेन्द्रियों का कार्य संपादित हो पाता है। कर्मेन्द्रियों का क्रियाकलाप, जीवन्तता स्पष्ट न रहते हुए भी कुछ क्षण, कुछ दिन, कुछ मास और वर्ष तक भी पराधीनता विधि से सप्राणित रह सकता है अर्थात् श्वास और हृदय क्रिया चल सकती है। इस अवस्था में मनुष्य सहज परिभाषा का

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