हुआ। ऐसे कुछ यंत्र संचार के लिये मार्ग और सेतु का चित्रण हुआ। इसी से सम्बन्धित अनेकानेक वस्तु, सामग्री, यंत्रों का चित्रण मानव ने किया है।

जीवनी क्रम जीवों में वंशानुषंगीय स्वीकृति के रूप में देखने को मिलता है। यही आशा बन्धन का कार्यकलाप है। वंशानुषंगीय कार्य में उस-उस वंश का कार्यकलाप निश्चित रहता है। तभी जीवावस्था व्यवस्था के रूप में गण्य हो पाता है। ऐसे जीव शरीर जो वंशानुषंगीय निश्चित आचरण को प्रस्तुत करते हैं उनमें समृद्घ मेधस का होना पाया जाता है। ऐसी वंशानुषंगीय रचना क्रम में मानव शरीर भी स्थापित है। इसकी परंपरा भी देखने को मिलती है। उल्लेखनीय मुद्दा यही है, मानव परंपरा में निश्चित आचरण स्पष्ट नहीं हो पाया। इसका कारण मानव ने तीनों प्रकार के बंधन वश जीवों के सदृश्य जीने का प्रयत्न किया। जबकि मानव अपने मौलिक विधि से ही जीने की प्रेरणा बना रहा। इसी क्रम में आचरणों की विविधता, विचारों की विविधता, इच्छाओं की विविधता, अनेकता का कारण बना। इसलिये केवल आशा, विचार, इच्छा से मानव में मानवीयता की स्थापना नहीं हो सकी। अथक प्रयास अवश्य किया गया। ‘जीवन’ के और आयामों का प्रयुक्ति मानव परंपरा में अवश्यंभावी होने के आधार पर ही अनुभवमूलक विधि का स्थापित होना अनिवार्यतम स्थिति बन चुकी है। – आ.व. 73-76

अस्तित्व में परमाणु का विकास और जागृति सहज अध्ययन क्रम में गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता, आचरणपूर्णता और इसकी निरंतरता को देखा गया है। देखने का तात्पर्य समझने से ही है। परमाणु का वैभव को, अस्तित्व में व्यवस्था की मूल इकाई के रूप में इनके कार्यकलापों को देखा गया है। यह जड़-चैतन्य प्रकृति के संबंध में स्पष्टतया समीकरण होता है। परमाणु अंशों से ही परमाणु रचित रहना पाया जाता है। हर अवस्था में आवेश अव्यवस्था का द्योतक है जैसे मानव में पायी जाने वाली छ: प्रकार के आवेश अव्यवस्था का द्योतक होना देखा गया है। मानव में घटित होने वाले आवेशों को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य के रूप में गणना किया गया है। यह मानव कुल में चर्चित, विश्लेषित, निष्कर्षित विवशता है। प्रत्येक आवेश विवशता के रूप में मानव सहज मानस विधि से मूल्यांकित होता है। (*जबकी) मानव सहज मानसिकता मानवीयतापूर्ण विधि से कार्यरत रहना पाया जाता है।

षड विकार – ६ आवेश

आवेश ही मनुष्य के लिए दुःख का कारण है।

  • काम:- प्रजनन या यौन संवेदना क्रिया में सुख पाने की प्रवृत्ति की काम संज्ञा है।
  • क्रोध:- स्वयं की अक्षमता का प्रदर्शन ही ‘क्रोध’ है।
  • मद:- असत्यता के प्रति मान्यता की पराकाष्ठा ही ‘मद’ है।
  • मोह:- मुग्ध हो जाना ही ‘मोह’ है। मोह से तात्पर्य है, दूसरों के प्रभाव में स्वयम् का खो जाना।
  • लोभ:- पात्रता से अधिक विशेष विभूति के प्रति उत्कट वांछा एवम् प्रयास ही ‘लोभ’ है।
  • मत्सर:- दूसरे के ह्रास एवम् पतन हेतु उत्कट कामना ‘मत्सर’ है।

मन में आवेश, वृत्ति में हठ, चित्त में भ्रम तथा बुद्धि में अहंकार ही आवर्तन-क्रिया है, और मन में मित्र-आशा, वृत्ति में विचार, चित्त में इच्छा और बुद्धि में संकल्प ही प्रत्यावर्तन-क्रिया है I आवेश के मूल में हठ, हठ के मूल में अभिमान और अभिमान के मूल में अहंकार है

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