जीवन में मन, वृत्ति, चित्त, बुद्घि और आत्मा पाँच अक्षय बल तथा आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रामाणिकता रूपी पाँच अक्षय शक्तियाँ प्रमाणित होने के लिए तत्पर हैं। जिनमें से आशा, विचार, इच्छा रूपी शक्तियाँ शरीर को जीवन मानते हुए शरीर को ही सुख का स्त्रोत मानते हुए, बँटवारा को व्यवस्था का आधार मानते हुए और वस्तुओं को ज्यादा से ज्यादा संग्रह करना सुख का साधन मानना यही सब प्रधानत: भ्रम रूपी कार्य कलाप का स्वरूप बतायी रहती है। इस क्रम में प्रधानत: शरीर के आयु के अनुसार प्रलोभन विधि से उत्साहित करना-होना, पराभवित होना देखा गया है।

शरीर को जीवन मानने के आधार पर शरीरोपयोगी यथा शरीर के लिए प्रिय, हितकारी वस्तुओं को चयन करने जाते हैं तब लाभापेक्षा होता ही है। इस विधि से जब प्रिय, हित, लाभकारी वस्तुओं को मानव चयन करता है, यह कार्य चित्रण तक सम्पादित होता है।

चयन के अनुरूप आस्वादन क्योंकि शरीर को ही जीवन मानने के आधार पर आस्वादन के अनुसार विश्लेषण, विश्लेषण के अनुसार शरीर सीमावर्ती और शरीरोपयोगी वस्तुओं के सम्बंध में विश्लेषण और उसी का चित्रण सम्पादित होना पाया गया। प्रिय, हित, लाभ सीमावर्ती तुलन, चिन्तन का वस्तु नहीं बनती क्योंकि ये सब रुचिमूलक होने के आधार पर पुन: यह सब आस्वादन या भोगमूलक ही होती है। सम्पूर्ण भोग विधि भी आस्वादन के अर्थ में समीचीन है। सभी आस्वादन पंच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा होता है। दूसरे शब्दों में सभी आस्वादन पंच ज्ञानेन्द्रियों-पंच कर्मेन्द्रियों में, से, के लिए होता है। इसी को मानव जाति का सम्पूर्ण कार्यक्रम स्वीकारना ही भ्रम का द्योतक है। इस सीमा के मानव सर्वशुभ रूपी दिशा से विमुख रहता ही है। फलस्वरूप अनगिनत प्रताड़नाओं से क्लेशित होना; दु:ख, शोकादि पीड़ाओं से पीड़ित होने के रूप में देखा गया है। यह सब भ्रम को ही सत्य मानने का फलन रहा। यथा मृगतृष्णा-मरीचीकावत् अथवा रज्जू-सर्पवत् पराभव का सूत्र बनता है। इसी क्रम में जीवन को जीवन और शरीर को शरीर समझना अति अनिवार्य है। हर मानव को यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता को यथावत् समझना अति अनिवार्य है। इसमें तीन ही मुद्दा प्रधान रूप में आते हैं - अस्तित्व, जीवन और मानवीयतापूर्ण आचरण। यही मानव में, से, के लिए मौलिक आचरण के रूप में पहचाना गया।

भ्रमित मानव का सामाजिक होने का प्रश्न ही नहीं होता। अमानव ही पशुमानव और राक्षस मानव के रूप में व्याख्यायित होते हैं। राक्षस मानव क्रूरता प्रधान होते हैं और पशु मानव दीनता प्रधान रहते हैं, ये दोनों अमानवीय कोटि में आते हैं। इसीलिए अमानवीय परंपरा में अपराधों का पनपना होता ही है। - भ.व. 139

आशा बन्धन से ‘जीवनी क्रम’ परंपरा को आरंभ किया हुआ जीवन, आशा से विचार, विचार से इच्छा बन्धन तक भ्रमित विधि से मानव कार्यकलापों को प्रस्तुत करता है। इच्छाएँ चित्रण कार्य को, विचार विश्लेषण कार्य को और आशा चयन क्रिया को सम्पादित करता हुआ मानव परंपरा में आस्था, प्रलोभन और भय में जीता रहता है। प्रिय, हित, लाभ संबंधी संग्रह-सुविधा-भोग द्वारा प्रलोभन के अर्थ को; युद्घ, शोषण, द्रोह-विद्रोह-संघर्ष ये सब भय को और भक्ति-विरक्ति पूर्वक आस्था त्याग-वैराग्य को मानव ने प्रकाशित किया है। यह परंपरा सहज विधि से ही होना पाया जाता है। परंपरा में इसी के लिये शिक्षा-संस्कार, उपदेश, शासन-पद्घति, संविधान भी स्थापित रही है। इसी क्रम में सामान्य आकांक्षा और महत्वाकांक्षा संबंधी और सामरिक सामग्रियों के रूप में अनेकानेक चित्रण कार्य सम्पन्न

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