सुलभ हो गया है। इसके सर्व सुलभ होने के लिए ही मानवीय शिक्षा-संस्कार परम्परा, मानवीय संविधान, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था, अखंड समाज और उसकी निरंतरता आवश्यक है। यह पूर्णतया कृपा, करूणा पूर्ण स्वभाव का ही कार्यक्रम है।
11. दम 12. क्षमा
दम :- (1) ह्रास की ओर जो आसक्ति है उसकी समापन क्रिया। (2) भ्रम, भय और अपव्ययता से मुक्ति। और जागृति पूर्ण प्रकृति में निष्ठा।
क्षमा :- विकास के लिए की जाने वाली सहायता के समय उसके ह्रास पक्ष से अप्रभावित रहना।
“दम”अस्तित्व गत क्रिया के रूप में सभी प्रकार के आवेशों से अथवा आवेशित गतियों से मुक्त रहकर स्वभाव गति प्रतिष्ठा में होने के रूप में वर्तमान है। अस्तित्व में स्वभाव गति प्रतिष्ठा के अनंतर पूर्व में जो आवेश था उसका संदर्भ और प्रभाव मिट जाने से है। भ्रमित मानव प्रकृति की सर्वाधिक स्मृतियाँ मानव के आवेशों, अत्याचार स्मृति सन्दर्भ के रूप में कार्य करता हुआ दिखता है। मानव में कर्म स्वतंत्रता, कल्पनाशीलता सदा ही क्रियाशील है। इन्हीं विकास क्रम में संयोगवश सर्वाधिक सम्मति-असम्मतियों के मूल में विरोधाभासी स्मृतियाँ क्रियाशील रहती है। इस प्रकार अस्तित्व सहज रूप में पदार्थावस्था में आवेशों का सामान्य होने का कार्य परस्परता में स्पष्ट है। प्राणावस्था में संयोग-वियोग क्रम में ही रचना-विरचनाओं का होना स्पष्ट है। प्राणावस्था में आवेश का अर्थ ही निष्पन्न नहीं हो पाता। इसका तात्पर्य यही हुआ कि आवेश का सामान्यीकरण रासायनिक क्रिया-प्रक्रिया के पहले ही भौतिक क्रियाकलाप में ही सामान्य अथवा स्वभाव गति प्रतिष्ठा हुई रहती है। क्योंकि समृद्ध पदार्थावस्था के योग संयोग से ही सम्पूर्ण रासायनिक प्रक्रिया और रचना-विरचनाओं का होना मानव देख सकता है।
जीवावस्था में शरीर और जीवन का संयुक्त रूप होने के फलस्वरूप जीवों में कुछ स्मृतियाँ आंशिक रूप में सजातीयता को पहचानने, विजातीय व विरोधी जाति के जीवों को पहचानने के क्रम में सर्वेक्षित होती है।
मानव में मानवत्व ही व्यवस्था सूत्र है एवं स्वयं में व्यवस्था तथा समग्र व्यवस्था में भागीदारी होने का ध्रुव है। दूसरा ध्रुव स्थिरता और निश्चयता पूर्ण अस्तित्व ही है। इन दोनों ध्रुवों के बीच में समग्र व्यवस्था में भागीदारी को और प्रत्येक मानव स्वयं में एक व्यवस्था है इस सहज सत्य को अध्ययन कर सकता है।