मानव में मानवीयता ही उसकी स्वभाव गति है। वर्ग समुदाय चेतना पर्यन्त आवेशों की स्मृतियाँ बनी रहती हैं। यह परस्पर समुदायों के ऐतिहासिक प्रभावन कार्यों के आधार पर बनी हुई हैं। इससे यह भी ज्ञान हो जाता है कि एक समुदाय में सभी समुदाय, विलय नहीं हो सकते। सभी समुदायों की अस्मिता बनी रहेगी। समुदाय परम्परा में दम और क्षमा का प्रमाण ऐसी स्थिति में नहीं हो पाएगा। दम और क्षमा प्रत्येक मानव के लिए आशित है। यह अखंड समाज परम्परा में ही प्रमाणित होना समीचीन है।
दम और क्षमा वह अद्भुत जागृत जीवन सहज अभिव्यक्ति है जिसमें आवेश की पीड़ा किंचित भी शेष नहीं रह जाती। आवेशित अवस्था के मानव के संदर्भ में अमानवीय कृत्यों की क्षमा का अधिकार मानवीयता को पहचानने के उपरान्त ही हो पाता है। मानवीय मानसपूर्ण कार्य व्यवहार विन्यास व्यवस्था ही हो पाती है। व्यवस्था में अव्यवस्था विलय हो जाती हैं। न्याय वर्तमान होने से अन्याय अपने आप ही विलय होता है। सर्वतोमुखी समाधान प्रमाणित होने की स्थिति में सब गलतियाँ अपराध विलय हो जाते हैं। इस प्रकार मानवीयतापूर्ण चरित्र में कहे गए चारों प्रयोजन वर्तमान होना और इसके विपरीत चारों भ्रमात्मक चरित्र विलय होना पाया जाता है। दम और क्षमा मानव व्यवहार, व्यवस्था, आचरण कार्यों पूर्ण मानव परम्परा में ही सम्पूर्ण प्रकार के समुदाय विलय होना सहज है। विलय का तात्पर्य - अभाव के स्थान पर भाव होना है। अभाव का अस्तित्व होता नहीं है, अभाव केवल भ्रम है।
13. तत्परता 14. उत्साह
तत्परता :- (1) जागृति, जागृतिक्रम, विकास क्रम में सक्रियता। (2) उत्पादन क्रियाकलाप में लगनशीलता। (3) मानवीयता व्यवहार आचरण में निष्ठा। (4) स्वयं में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी सहज उदय की ओर परावर्तन क्रिया।
उत्साह :- उत्थान के लिए साहस।
उत्थान का तात्पर्य मानव, देव मानव संस्कृति, सभ्यता, विधि व्यवस्था में निष्ठा।
तत्परता एक जागृत जीवन सहज क्रिया है। अभिव्यक्ति क्रम में तत्परता का अर्थ जीवन जागृति तथा उसकी निरंतरता को प्रमाणित करने की क्रिया है। तत् से अभ्युदय और निःश्रेयस ही इंगित होता है, यह जीवन जागृति और लक्ष्य का प्रमाण है। जागृत जीवन में जब प्रमाणों को व्यक्त करना होता है इस क्रम में सभी जीवन शक्तियाँ अपने-अपने कार्य करना सहज है। इसी क्रम में