विधि से नियमित, नियंत्रित, संतुलित होना वर्तमान में पाया जाता है। मानव जागृति पूर्वक ही संतुलित, नियंत्रित, नियमित होना और न्याय, धर्म, सत्यपूर्वक प्रमाणित होना पाया जाता है। जागृति प्रमाण को प्रत्येक व्यक्ति अपने में परीक्षण कर सकता है।
मानव में जागृति जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने के रूप में स्पष्ट है। जानने-मानने के लिए मूलतः अस्तित्व ही है। अस्तित्व ही अपने आयामवत् सहअस्तित्व, विकास क्रम, विकास, जीवन, जीवनी क्रम, जीवन जागृति क्रम, जीवन जागृति और रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना के रूप में समीचीन है। प्रत्येक मानव जीवन व शरीर का संयुक्त रूप है। पहचानने व निर्वाह करने के लिए मानव तथा नैसर्गिक संबंध व मूल्य हैं।
नैसर्गिक संबंध जलवायु, धरती, हरियाली, अनंत ग्रह, गोल, नक्षत्र हैं। ग्रह, गोल, नक्षत्रों एवं सूर्य की किरणों से उपकृत यह धरती अपनी समृद्धि के साथ प्रमाणित है। इस धरती पर मानव का अवतरण जीव-वनस्पतियों से समृद्ध होने के उपरान्त ही सहज हुआ है।
मानव एवं अन्य प्रकृति में मौलिक विशेषता यह है :-
(1) मानवीय परम्परा में जीवन अपनी जागृति को शरीर द्वारा व्यक्त कर सकता है करना चाहता है।
(2) मानव ही कर्म स्वतंत्र एवं कल्पनाशील है।
(3) भ्रमित रहते तक मानव ही कर्म करने में स्वतंत्र, फल भोगते समय परतंत्र है।
(4) मानव ही मनाकार को साकार करने वाला, मनः स्वस्थता का आशावादी है।
(5) मानव ही जागृति पूर्वक अपने स्वत्व स्वतंत्रता, अधिकारों को परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था और अखंड समान रूपी सार्वभौम व्यवस्था के रूप में प्रमाणित करता है।
इन पाँचों प्रकार से मौलिकताओं की सहजतावश जागृति पूर्वक ही मानव का संतुलित, नियंत्रित, नियमित होना, स्वानुशासन, स्वयं में व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी, संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह सहज उत्साह, स्वयं स्फूर्त उत्सव के रूप में आचरित होगा। ऐसा हर मानव होना चाहता है।
जागृत मानव में दया, कृपा, करूणा सहज ही प्रवाहित होती है। जो स्वयं सुख, सुन्दर, समाधान है। ऐसी जीवन शैली व परम्परा को मानव के लिए अनुसंधान करना आवश्यक रहा है। वह