जीवन शक्तियाँ विभिन्न प्रयोजनों को सार्थक बनाने के कारण उन-उन क्रियाओं का नामकरण मानव ही करता है। नामकरण किसी अर्थ का प्रतीक है। नाम या प्रतीक प्राप्ति नहीं है। अस्तित्व में विभिन्न स्थिति-गति, परिणाम, विकास, जागृति, प्रयोजन ही सम्पूर्ण अर्थ और प्राप्तियाँ अनुभूति है। सम्पूर्ण अनुभूति या तृप्ति उसकी निरंतरता है। यह शब्द या भाषा से इंगित अर्थ को जानने-मानने अथवा जानने-मानने के तृप्ति बिंदु का अनुभव है। जीवन में अनुक्रम पूर्वक होना (वर्तमान) अनुभव है। अस्तित्व में अनुभव ही जीवन में परम जागृति है।
जागृति की अभिव्यक्ति में सर्वतोमुखी समाधान प्रमाणित होता है। मानवीयता सहज परम्परा का सूत्र सार्वभौम व्यवस्था अखंड समाज के रूप में व्याख्यायित है। इसलिए यह मानव के वैभव का अर्थ है। यही मानव धर्म है, क्योंकि समाधान = सुख है तथा मानव सुखधर्मी है।
जागृति भ्रम मुक्ति का प्रमाण है फलस्वरूप प्रामाणिकता की अभिव्यक्ति स्वानुशासन के रूप में स्पष्ट होती है। ऐसी स्पष्टता को बनाए रखना ही तत्परता है। ऐसी तत्परता नित्य उत्सव को प्रावधानित करती है। इसलिए उत्साह का अर्थ जागृति पूर्वक जीने की कला में सार्थक होता है।
उत्साह अपने जीवन प्रयोजन (अभ्युदय निःश्रेयस) के अर्थ में किया गया संकल्प सहित गति है अथवा उत्थान (जागृति) के अर्थ में जीवन सहज रूप में किया गया साहस। इसलिए प्रेम, विश्वास पूर्ण भाषा, भाव, मुद्रा भंगिमा-अंगहार समेत व्यक्त किया गया क्रियाकलाप उत्सव है। इस प्रकार तत्परता व उत्साह का सार्थक प्रयोजन समझ में आता है।
15. कृतज्ञता 16. सौम्यता
कृतज्ञता :- जिस किसी की भी सहायता से उन्नति (विकास और जागृति) की प्राप्ति में सफलता मिली हो उसकी स्वीकृति।
सौम्यता :- स्वेच्छा से स्वयं का नियंत्रण।
जीवन जागृति क्रम में (अथवा विकास में) जिस किसी से भी सहायता प्राप्त हुई हो उसे स्मरण में रखना और स्वीकारना तथा स्वीकार किये हुए को अभिव्यक्त करना कृतज्ञता है। यह समाधान में, से, के लिए सहायक प्रक्रिया है। जीवन ही जागृति पूर्वक समाधान का धारक-वाहक होता है। सम्पूर्ण जागृति समाधान और प्रामाणिकता के रूप में प्रमाणित हो जाना ही मानव परम्परा की गरिमा व महिमा है। मानव समाधान पूर्वक ही सुख और शांति का अनुभव करता है।