मानव में जीवन जागृति जानने-मानने, पहचानने व निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित होता है। यह प्रत्येक मानव की एक अपरिहार्यता है। मानव जब भी संतुष्ट होता है तब दूसरे के साथ व्यवहार करना एक आवश्यकीय प्रक्रिया है। असंतुष्टि आवेशपूर्वक मानव की परस्परता में होने वाला व्यवहार समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व चरितार्थ न होने से है। मानव की व्यावहारिक सार्थकता की यही चार उपलब्धियाँ हैं। मानव सहज लक्ष्य के लिए मानव कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित प्रभेदों से कार्य करता है। मानव परम्परा की उपलब्धियाँ यही हैं। मानव परम्परा अर्थात् अखंड समाज और सार्वभौम व्यवस्था का लक्ष्य यही है। लोक-न्याय सुलभता से अभय सार्थक होना अर्थात् परस्परता में विश्वास होना स्वयं अभयता है तथा सहअस्तित्व का द्योतक है। मानव जागृति और उसकी निरन्तरता में समाधान सम्पन्न होता है। फलस्वरूप लोक न्याय (अभय और सहअस्तित्व) तथा समाधान जीवन गत स्वत्व है। इसके व्यवहारान्वयन में सर्वतोमुखी समाधान ही सम्प्राप्त होता है। इसी के आधार पर जीवन विद्या व वस्तु विद्या का परिष्कृत ज्ञान की धारक-वाहकता पूर्वक शिक्षा-पद्धति, प्रणाली, नीति-संगत होकर लोकव्यापीकरण होता है। यही शिक्षा प्रकाशन, प्रदर्शन एवं प्रचार का तात्पर्य है। यही जागृति सहज मानव संचेतना का द्योतक है।

प्रत्येक व्यक्ति कृतज्ञता विधि से ही सौम्य होना पाया जाता है। सौम्यता का तात्पर्य स्वभाव गति प्रतिष्ठा से है। स्वभाव गति प्रतिष्ठा ही दूसरे शब्दों में शिष्टता कहलाती है। सम्पूर्ण शिक्षा व लोक शिक्षा शिष्टता के अर्थ में अर्थात् स्वभाव गति प्रतिष्ठा के अर्थ में सार्थक होना पाया जाता है। यह कृतज्ञता पूर्वक, सौम्यता पूर्वक सार्थक हो पाता है। मानव की सहज अभिलाषा अभ्युदय ही है अथवा समाधान की आकाँक्षा है। प्रत्येक मानव समाधान की अपेक्षा में ही सब कुछ करता है। उसके सफल होने की विधि में कृतज्ञता व सौम्यता एक अनिवार्य बिंदु और अभिव्यक्ति है।

जागृत जीवन ही अपने में सम्पूर्ण होते हुए देश, काल, दिशा, नैसर्गिक जिज्ञासा व आवश्यकताओं को पाकर जीवन ऐश्वर्य का नियोजन करता है। जीवन ऐश्वर्य को आशा, विचार-इच्छा-संकल्प व अनुभव मूलक प्रामाणिकता के नाम से जाना जाता है। यह सम्मिलित रूप में संचेतना के अर्थ को जानने-मानने व पहचानने के रूप में प्रमाणित करता है। यह प्रत्येक व्यक्ति में होने वाली प्रक्रिया है। यही (अर्थात् आशा, विचार, इच्छा, संकल्प व अनुभुव मूलक प्रामाणिकता अपनी-अपनी क्रियाओं को स्पष्ट करते समय अथवा स्पष्ट करने की स्थिति में)

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