कमशः दो-दो क्रियाओं के रूप में व्यक्त होते हैं। वह है चयन-आस्वादन, विश्लेषण-तुलन, चिंतन-चित्रण, बोध-संकल्प, अनुभूति व प्रामाणिकता।

इसी के विस्तार रूप 122 क्रियाओं में यह अध्ययन-गम्य होता है। जिसमें से वृत्ति में होने वाली 36 क्रियाओं में से अर्थात तुलन व विश्लेषण के संयुक्त रूप में होने वाली क्रियाओं में, से कृतज्ञता व सौम्यता जीवन सहज क्रिया है। यही सब जागृति का द्योतक है।

जागृत जीवन सहज क्रियाएँ, जीवन तृप्ति के अर्थ में ही हो पाती हैं। जीवन तृप्ति प्रामाणिकता व समाधान सम्पन्नता ही है। इसका सम्मिलित रूप जीवन जागृति है। यही जीवन जागृति का व्यवहार प्रमाण और भ्रम मुक्ति है। जीवन जागृति क्रम में भ्रम मुक्ति का प्रधान उद्देश्य समाया रहता है। जीवन जागृति पर्यन्त यात्रा है, जागृति की निरंतरता ही जीने का अर्थ है। जागृति पूर्ण मानव परम्परा का ही समाज व व्यवस्था अक्षुण्ण होता है।

जागृति परम्परा ही मानव का एक मात्र शरण है। इसकी संभावना नित्य समीचीन है। जागृति परम्परा में ही मानवीय शिक्षा-संस्कार सुलभ होता है। अध्ययन पूर्वक विकास और जागृति का लोकव्यापीकरण सहज है। जागृति क्रम में सहज ही कृतज्ञता-सौम्यता से प्रत्येक व्यक्ति व परिवार सम्पन्न होता है।

मानव परम्परा में प्रत्येक मानव का जन्म से ही किसी परिवार का सदस्य होना नैसर्गिक है। यह सर्वत्र प्रमाणित है। मानव परम्परा में ही व्यक्ति में समझदारी सहित परिवार; समाधान-व्यवस्था, शिक्षा जैसी परम्परा में से प्रभावित, प्रेरित, प्रमाणित होता है यह एक अनिवार्य स्थिति है।

मूलतः दर्शन सहअस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन होने के कारण रहस्य का समापन वर्तमान में सम्पूर्ण प्रमाण सहज सुलभ हो गया। यह प्रमाण प्रयोग, व्यवहार व अनुभव में प्रमाणित होता है। यह अध्ययनगम्य होता है।

जहाँ तक सहअस्तित्व वादी विचार शैली है, वह विगत से आयी तर्कों और विसंगतियों लक्ष्य, समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेंदारी में विरोधाभास को दूर कर देती है। साथ ही विज्ञान (विश्लेषण का तात्पर्य कालवादी, क्रियावादी, निर्णयवादी तथ्यों को स्पष्ट करना) सम्मत विवेक (प्रयोजन) तथा विवेक सम्मत विज्ञान विधि से पूरी विचार शैली है। फलस्वरूप विसंगतियाँ दूर होती हैं। यह सहअस्तित्व वाद है। जो अस्तित्व सहज है। यह अध्ययन के लिए समर्पित है। इसके मूल में जो दर्शन है उसका नाम मध्यस्थ दर्शन रखा गया है। यह अध्ययन की मूल वस्तु है।

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