“व्यवहारवादी जन चेतना”
यह मूलतः मानव कुल की शुभाकाँक्षा के अनुरूप मानव संबंधों एवं नैसर्गिक संबंधों को पहचानने और मूल्यों के निर्वाह करने के ध्रुव पर आधारित है। इसमें जिन-जिन संबंधों को जैसा-जैसा पहचानना है, वह भी जाने-अनजाने मानव कुल में प्रचलित है वह निश्चय का आधार है। साथ ही स्वयं कितने संबंधों में सूचित हो सकता है। उसको आंकलित करने पर उतने ही संबंध निकल आते हैं जितना प्रचलित है। इन तथ्यों पर आधारित क्रम से जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव का अध्ययन सहज हुआ। जीवन तृप्ति के लिए शरीर यात्रा के लिए संबंध प्रचलित होना पाया गया अथवा आवश्यकता होना पाया गया। इसलिए व्यवहारवादी जनचेतना को पहचानना अनिवार्य हुआ। पता चला कि जीवन ज्ञान और अस्तित्व दर्शन ही जन चेतना है। जीवन ज्ञान के अनुसार जीवन तृप्ति मूल्यों का परावर्तन व प्रत्यावर्तन ही है। यह समाधान को प्रमाणित करता है। यही समाधान का स्रोत है। इसका लोक व्यापीकरण करने के लिए, शिक्षा में इसे सुलभ करने की संभावना है।
यह स्पष्ट हुआ कि जन चेतना का मूल तत्व जीवन ज्ञान है। जीवन ज्ञान के आधार पर ही मानवीयता को जीवन प्रकाश में पहचानना सहज होता है फलस्वरूप सभी संबंधों में निहित मूल्यों को यथावत निर्वाह करने की स्वाभाविक क्रियाकलाप सम्पन्न होती है। इसी के साथ यह भी स्पष्ट होता है कि शरीर पोषण, संरक्षण और समाज गति के लिए आवश्यकीय वस्तुओं व उपकरणों को प्राप्त करने व सदुपयोग करने और प्रयोजनशील बनाने की विधियाँ अध्ययनगम्य हुई हैं।
ऐसी वस्तुओं का उत्पादन जीवन शक्तियों के संयोग से शरीर के अवयवों द्वारा श्रम नियोजन पूर्वक संपादित होती है। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए जन मानस को यह भी विश्वास दिलाया है कि भौतिक वस्तु की आवश्यकता शरीर तक ही है। जीवन तृप्ति के अर्थ में उपयोग, सदुपयोग और प्रयोजनशीलता को स्पष्ट किया है। जीवन शरीर के द्वारा मानव परम्परा में अपनी जागृति को प्रमाणित करना ही परम उद्देश्य है। यही प्रयोजन है। इसे सार्थक बनाने के क्रम में शरीर यात्रा जीवन के लिए एक साधन है न कि साध्य।
जीवन ज्ञान के आधार पर मानव मानवत्व को पहचानने के उपरान्त अखंड समाज में भागीदार और सार्वभौम व्यवस्था में भागादीर होने का सत्य समझ में आता है। फलस्वरूप संबंधों व मूल्यों की पहचान व निर्वाह सहज होता है।