मानवीयता पूर्ण मानव परम्परा में, से, के लिए सार्थक रूप देने के क्रम में जो कुछ सहायता मिली उसका स्वीकार होना सहज है। फलस्वरूप सौम्यता परम्परा में सार्थक परिभाषा के अनुसार वर्तमान होती है। इस प्रकार मानव को कृतज्ञ होने के लिए आजीविका, स्वास्थ्य, विद्या, समाधान, प्रामाणिकता, प्रमाण (जिनमें से समाधान, प्रामाणिकता इनका स्रोत रूपी विद्या) सुलभता में से, के लिए जो सहायता मिली उसके प्रति कृतज्ञ होना भी है। संघर्ष में कृतज्ञता का स्थान नहीं है।
17. गौरव 18. सरलता
गौरव :- निर्विरोध पूर्वक, अंगीकार किए गए अनुकरण।
सरलता :- ग्रंथि व तनाव रहित अंगहार।
मानव का अभिव्यक्त होना जीवन सहज कार्य है। अभ्युदय के अर्थ में प्रमाणित होना ही अभिव्यक्ति है। अभ्युदय सर्वतोमुखी समाधान मानव धर्म है क्योंकि समाधान = सुख। समस्या = दुख। अव्यवस्था का प्रभाव = समस्या = पीड़ा। अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है। इस धरती पर पदार्थावस्था मृद मृदत्व के साथ, सभी धातुएँ धातुत्व के साथ, पाषाण पाषाणत्व के साथ, मणियाँ मणित्व के साथ व्यवस्था हैं। यह समग्र व्यवस्था के साथ भागीदारी है।
हर वस्तु का स्वयं में व्यवस्था होना उसके परस्परता में सह अस्तित्व सहित वर्तमान होने से है। यही समग्र व्यवस्था में भागीदारी का सूत्र है। वर्तमान निरंतरता के अर्थ में है। लोहा, लोहत्व के साथ वर्तमान है। लोहत्व मूलतः अपने ही प्रजाति के परमाणु के रूप में ही है। किसी संख्यात्मक अंशों का (अथवा निश्चित संख्यात्मक अंश) नाभि क्षेत्र में ही उसके सन्तुलन से उसका आक्षित परिवेश और संख्यात्मक अंशों का क्रियारत रहना पाया जाता है। इसी प्रकार हर प्रजाति के परमाणु अपने मध्यांश, परिवेश में कार्यरत अंशों के योगफल में मात्रा है। भौतिक रूप में अणु (अनेक परमाणुओं के रचित रचना) और रासायनिक अणुओं से रचित रचनाएँ सहअस्तित्व सहज है। जीवन जागृति क्रम में यह सब अध्ययन हो पाता है। इस प्रकार ऐसी व्यवस्था को मानव जागृति पूर्वक वर्तमान को पहचानता है, विकास क्रम में पूरक विधि से मनुष्येत्तर प्रकृति समझ में आता है।