अस्तित्व सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में सहअस्तित्व वर्तमान है। सहअस्तित्व में ही पूरकता, उदात्तीकरण, विकास, संक्रमण और जागृति व्याख्यायित है। सहअस्तित्व नित्य प्रभावी है, इसका प्रमाण सत्ता में प्रकृति की अविभाज्यता है। इसी आधार पर अस्तित्व में परस्पर व्यवस्था है। इसका प्रमाण है - वर्तमान में विकास, जागृति, पूरकता और उदात्तीकरण। मानव अस्तित्व में दृष्टा होने के कारण प्रत्येक मानव का जागृति पूर्ण परम्परा में होना वर्तमान है। मानव ही श्रेष्ठता का मूल्यांकन करता है। उपयोग, सदुपयोग व प्रयोजनीयता के आधार पर मूल्यांकन होना सहज है। उपयोगिता का ध्रुव बिंदु जागृति है। मानव की उपयोगिता, स्थिरता व निरंतरता जागृति सहज विधि से आवश्यकता से अधिक उत्पादन तन, मन व धन रूपी अर्थ का संबंध व मूल्यों में अर्पण-समर्पण करते हुए उत्सवित होना पाया जाता है। इसी से मानव सर्वाधिक खुशी का अनुभव करता है और सुख का प्रमाण प्रस्तुत करता है।

यही उपयोगिता-सदुपयोगिता का मापदण्ड है। संबंध व मूल्यों में, जीवन जागृति का लक्ष्य समाया रहता है। सदुपयोगिता का आधार मापदण्ड यही है कि परिवार मानव (अथवा मानव परिवार) तन, मन, धन रूपी अर्थ को सम्बंधों में अर्पित-समर्पित कर प्रसन्नता और समाधान का अनुभव करता है। प्रसन्नता और समाधान का प्रमाण प्रस्तुत करता है। प्रयोजनीयता का प्रमाण जीवन जागृति सहज स्वानुशासन है। समझदारी का प्रमाण मानवीय कर्तव्यों व दायित्वों का निर्वाह करना ही है। यही उपयोगिता एवं सदुपयोगिता का प्रमाण है। मानवीयता का मार्गदर्शक, अतिमानव रूपी देव मानव व दिव्य मानव ही है। यही प्रयोजन है।

इस प्रकार उपयोगिता, सदुपयोगिता व प्रयोजनीयता के अर्थ में प्रमाणों का होना, प्रमाणों की दर्शकता और प्रमाणों की महिमा है। इस प्रकार विकसित जागृत, सार्थक मानव से शिक्षा संस्कार पाने, जागृत होने और प्रमाणित करने के उद्देश्य भ्रमित और अविकसित मानव में भी प्रवर्तन होना पाया जाता है। भ्रमित (अविकसित) मानव में भी प्रमाण व प्रामाणिकता की अपेक्षा का होना ही जागृत होने का सूत्र है। विकसित जागृत मानव मूल्यों का निर्वाह करते हुए मूल्यांकन पूर्वक श्रेष्ठता का गौरव पाता और करता है।

गौरव स्वयं मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति के अर्थ में (अथवा स्वीकार किया हुआ के अर्थ में) प्रतिपादन, अभिव्यक्ति व संप्रेषणा है। ऐसी अभिव्यक्ति, संप्रेषणा सरलता पूर्वक होना पाया जाता है। सरलता अपने में जिस गौरव को व्यक्त करती है उसके लिए किया गया शरीर विन्यास सम्पूर्ण आवेशों से मुक्त स्वभाव गति सम्पन्न मानव सहज गति है। धीरता, वीरता, उदारता पूर्ण मुद्रा,

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