यह समझदारी पूर्वक प्रमाणित होता है। स्वयं में विश्वास तभी सहज और संभव हो पाता है, जब मानव अपने को पूर्णतया (स्वयं को पूर्णतया) निर्भ्रम रूप में समझ लिया रहता है। इसका मतलब यह हुआ कि स्वयं में, से, के लिए समझे रहना आवश्यक है।

मानव अपने को समझने की क्रिया में शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में शरीर यात्रा का मानव में होना पाया जाता है। यही समझदार परम्परा का आधार है।

(1) शरीर कार्य व प्रयोजन।

(2) जीवन सहज कार्य व प्रयोजन।

(3) जीवन और शरीर की संयुक्त अभिव्यक्ति का सूत्र सहअस्तित्व।

(4) अस्तित्व में मानव अविभाज्य वर्तमान। इन तथ्यों को समझना आवश्यक है।

शरीर कार्य को अंगों व अवयवों के रूप में देखा जाता है। आंख, कान, नाक, हाथ, पैर ये सभी अंग है। इनका कार्य सर्वविदित है कि आंख से देखना, कान से सुनना, पैरों से चलना इत्यादि। इन सब कार्यों को जीवन शरीर के द्वारा संपादित करता है यह देखने को मिलता है। शरीर को जीवन्त बनाए रखते हुए जागृत जीवन चयन-आस्वादन, तुलन-विश्लेषण, चित्रण-चिंतन, बोध-संकल्प, अनुभव-प्रमाणिकता में प्रमाणित होता है।

मानव एक ऐसी इकाई है जिसका वास्तविकता व यथार्थता के साथ ही व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदार होना बनता है। जागृत मानव सत्यता सहज विधि से सुखी, समाधानित व प्रमाणित होना बन पाता है। इन सहअस्तित्व सहज प्रभाव को देख तथा समझ पाना ही जागृति है। यथार्थता, वास्तविकता व सत्यता के व्यवहार में प्रमाणित करना ही जागृति का प्रमाण है जिससे समाधान और प्रमाणिकता का ही लोकव्यापीकरण होना है।

इस धरती में सर्वप्रथम रहस्य मूलक ईश्वर केन्द्रित चिंतन ज्ञान को विद्या माना गया। उसमें मूलतः रहस्य और रहस्यमय ईश्वर इन दोनों प्रतिपादनों के कारण मतभेद बना रहा फलतः विद्वानों को रहस्य मूलक ईश्वर प्रमाण के रूप में हाथ नहीं लगा। उसके बाद यह भी प्रयास किया गया कि कोई देवी, देवता हाथ लगे। उसके आधार पर रहस्य मूलक, देव केन्द्रित चिंतन ज्ञान को प्रस्तुत किया गया। वे देवी-देवता भी रहस्य के चंगुल में फंसकर विद्वानों के हाथ नहीं लगे। फलतः सारे विद्वान व्यक्त-अव्यक्त ईश्वर अथवा देवी-देवताओं की बातें करते रहे, उपदेश देते रहे।

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