जहाँ जीने, करने की बात आती रही वहाँ सामान्य भौतिकवादी जैसा जीता रहा, वैसा ही जीते, करते देखा गया। यही मूलतः आदि काल से बनी हुई विद्या, विद्वता कहलाती रही। विद्वानों की परस्परता में अंतर्विरोध रहता आया। यह लोक मानस में सुनिश्चित मार्ग, लक्ष्य व कार्य को निर्धारित नहीं कर पाया। इन्हीं कारणों से कुछ लोग आशा रखते है कि निर्धारण हो पायेगा, कुछ सोचते है कि निर्धारण नहीं हो पायेगा।
अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन बनाम मध्यस्थ दर्शन के द्वारा निर्धारण करने के कुछ आधार बिंदुओ को प्रस्तुत किया है :-
(1) अस्तित्व स्थिर, विकास निश्चित है।
(2) अस्तित्व में स्थिति-गति अविभाज्य हैं। बल स्थिति में और शक्ति गति में है।
(3) सत्ता में संपृक्त अर्थात् ऊर्जा में संपृक्त अनंत इकाई रूपी प्रकृति अस्तित्व सर्वस्व है। सम्पूर्ण प्रकृति के जड़ और चैतन्य ये दो भाग हैं।
(4) चैतन्य प्रकृति में मानव व मनुष्येतर जीव हैं।
(5) जड़ प्रकृति में पदार्थावस्था व प्राणावस्था है।
(6) पदार्थावस्था में जितने भी प्रजाति के परमाणु रासायनिक अणु रचना के लिए आवश्यक हैं उससे वह समृद्ध होते तक अपने में परमाणु के रूप में विकासरत रहता है।
(7) समृद्ध पदार्थावस्था के अनंतर ही प्राणावस्था की समृद्धि, प्राणावस्था के अनंतर जीवावस्था की समृद्धि, जीवावस्था के अनंतर ज्ञानावस्था में मानव का सहअस्तित्व के रूप में वर्तमानित होना इस धरती पर प्रमाणित है।
(8) जागृति पूर्णता और उसकी निरंतरता होना लक्ष्य है।
(9) जागृति क्रम में अखंड सामाजिकता और सार्वभौम व्यवस्था मानव परम्परा में होना इसलिए आवश्यक है कि मानव को जागृति का अवसर सहज सुलभ हो सके।
(10) परमाणु में विकास होता है, विकासित परमाणु (गठन पूर्ण) चैतन्य पद प्रतिष्ठा अथवा जीवन पद होना पाया जाता है।