(11) जीवन गठन पूर्ण परमाणु है जिसकी निरंतरता वश जीवन का शाश्वत होना पाया जाता है।

(12) जीवन जागृति क्रम में सर्वतोमुखी समाधान व प्रामाणिकता को प्रमाणित करने के क्रम में जीवन सदा प्रयासशील है।

(13) मानव परम्परा की स्थिरता मानवत्व सहित व्यवस्था ही है। यह जागृति पूर्वक मानव में, से, के लिये प्रमाणित होता है। जागृति स्वयं निश्चित है।

मानवत्व की स्थिरता का तात्पर्य विकास और जागृति का निश्चित ध्रुव प्रामाणिकता, प्रमाण और उसकी अक्षुण्ता से है और सहज रूप में लोक न्याय सबको मिलने से हैं। लोक न्याय मिलने के लिए मानव परम्परा को जागृत रहना आवश्यक है।

इस लक्ष्य को चरितार्थ करने के लिए यह मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान और इससे जुड़ी हुई सभी वांङ्गमय मानव कुल के सम्मुख प्रस्तुत हुआ है। अलंकार, सत्कार, सम्मान, प्रतिज्ञा विधियों से सब अपने-अपने समुदायों की पहचान कर आधार बना चुकी हैं। ये सभी विधियाँ अपने को सार्वभौमता में प्रतिष्ठित करना भी चाहती हैं। सार्वभौमता का सूत्र मानवता ही है। इस कारण प्रत्येक समुदाय द्वारा मानवीय संस्कृति, सभ्यता, विधि व्यवस्था को पहचानना आवश्यक है।

व्यवस्था में न्याय सुरक्षा सुलभता, विनिमय कोष सुलभता, उत्पादन कार्य सुलभता, स्वास्थ्य संयम सुलभता और मानवीय शिक्षा संस्कार सुलभता का संयुक्त रूप है। इसी व्यवस्था में जीने की कला, संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, व्यवस्था में भागीदारी का संयुक्त रूप में प्रकाशित होना पाया जाता है। यह मानव संस्कृति का मध्य बिंदु है। मानव अपनी संस्कृति को व्यक्त करता है। उस समय आवास, अलंकार, उत्सव, सम्मिलित उत्सव, मानवीयता का प्रकाशन, प्रदर्शन और प्रचार ये सब प्रधान रूप में रहना स्वाभाविक है।

मानव में मानवीयता ही नित्य उत्सव का आधार है। उत्सव, उत्साह, हर्ष, उल्लास, विश्वास के आधार पर सहज ही जीवन शक्तियों का प्रवाह है अथवा अभिव्यक्ति है। अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी स्वयं उत्साह का साक्ष्य है। विश्वास (वर्तमान में स्वयं में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी) सहज सौजन्यता के संयोग में नित्य उत्सव होना पाया जाता है।

जीवन सहज उद्देश्य में से उत्सव एक आवश्यक अभिलाषा है अर्थात् अभ्युदय क्रम में पाई जाने वाली जीवन सहज क्रिया है। मानवीयता पूर्ण मानव में जागृत जीवन सहज क्रियाकलापों में से

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