मानव में समाधान व प्रामाणिकता समाज न्याय पूर्वक सुख, शांति, संतोष के रूप में प्रमाणित होता है और उसकी निरंतरता होती है। निरंतरता होने का तात्पर्य जीवन सहज रूप में, परम्परा सहज रूप में सार्थक होने से है। जीवन सहज रूप में आनंद व आनंद की निरंतरता जीवन जागृति में स्पष्ट होती है। जीवन जागृति प्रामाणिकता व समाधान को मानव परम्परा में व्यक्त करता है।

इसका अनुभव, विचार, व्यवहार व अध्ययनगम्य हो जाना ही परम्परा सहज होने का स्रोत है। ऐसे स्रोतों को मानव परम्परा वहन करे यह भी एक सहज प्रक्रिया है। मानव पंरपरा अपने में शिक्षा-संस्कार, स्वराज्य व्यवस्था, मानवीयता पूर्ण आचरण रूपी आचार संहिता और संविधान की धारक-वाहक है। यही परम्परा सहज जागृति का अर्थ है। यह प्रत्येक मानव सहज वांछित घटना है। इस प्रकार अस्तित्व सहज विकास और जागृति के योग फल में मानव परम्परा की प्रतिष्ठा भी सहअस्तित्व के रूप में प्रतिपादित है। अस्तित्व स्थिर होना नित्य वर्तमान सहज है। सहअस्तित्व में नित्य विकास और जागृति सहज प्रमाण निश्चित है और प्रत्येक अवस्था और पद परम्परा के रूप में स्थिर होना तथा उन-उन के “त्व” सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में यह व्याख्यायित है। यही अस्तित्व में अनंत की व्याख्या समग्र व्यवस्था के अनुभूत होने का प्रमाण है। साथ ही व्यापक में अनंत का नित्य वर्तमान होना स्पष्ट है ही।

मानव भी अस्तित्व में अविभाज्य वर्तमान है। अस्तित्व में जितने भी पद और अवस्थाएँ देखने को मिल रही हैं ये सब अस्तित्व में अविभाज्य हैं ही और अपने में परम्परा है। मानव के प्रकाशन और संप्रेषणा सुलभता के लिए अस्तित्व सहज विविधता को एक दूसरे को निर्देशित व इंगित कराते हुए जाना हुआ को जनवाने, माना हुआ को मनवाने, पहचाने हुए को पहचनवाने, निर्वाह किया हुआ को निर्वाह कराने के क्रम में उस-उस का नाम भी दिया जाता है। इसी क्रम में अस्तित्व में जो भी अवस्थाएँ हैं उसे चार रूपों में देखा गया है जिसे पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था व ज्ञानावस्था का नाम दिया गया है। ये चारों अवस्थाएँ अस्तित्व में अविभाज्य वर्तमान हैं। इनकी निरंतरता स्वयं अस्तित्व में स्थिर है अथवा अस्तित्व सहज रूप में ही इसका स्थिर और निश्चित होना प्रतिपादित है। मूलतः अस्तित्व ही सम्पूर्ण प्रतिपादन है। प्रतिपादन का तात्पर्य वर्तमान में प्रमाणित होना और उसकी निरंतरता होने से है।

अस्तित्व में जो भी क्रिया स्वरूप है वह सब स्थिति और गति का संयुक्त व अविभाज्य रूप है। कोई भी क्रिया अपनी स्थिति व गति से विभक्त नहीं हो पाती - जैसे इस धरती की स्थिति व गति अविभाज्य है। एक परमाणु की स्थिति व गति अविभाज्य है। परमाणुओं में निहित अंशों

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