जीने की कला एक वास्तविकता और परम्परा है। जिसकी अक्षुण्ता होती है। अनुभव बल, विचार शैली, जीने की कला के योगफल में मानव प्रमाणित होता है। अस्तु, विश्वास और सौजन्यता वर्तमान में व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी, अखंड समाज में भागीदारी और उसकी मूल्यांकन क्रियाकलाप है।

मानव सहज आचरण, व्यवहार व व्यवस्था मानव की अपनी जागृति सहित सम्पूर्ण होने का साक्ष्य है। सम्पूर्ण मानव जागृति के आधार पर ही अपनी संपूर्णता का मूल्यांकन करते हैं। जीवन के सभी आयाम अभिव्यक्ति क्रम व लक्ष्य के योगफल में प्रमाणित होते हैं। जागृत मानव सहज द्रष्टा पद, प्रामाणिकता व सर्वतोमुखी समाधान के रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है।

21. सत्य 22. धर्म

सत्य :- (1) जो तीनों कालों में एक सा भासमान, विद्यमान एवं अनुभव गम्य है। (2) अस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना के प्रति प्रामाणिकता का नित्य वर्तमान। (3) अस्तित्व सहज स्थिति सत्य, वस्तु स्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य नित्य वर्तमान।

धर्म :- (1) धारणा ही धर्म है। (2) जिससे जिसका विलगीकरण न हो।

सत्य अपने स्वरूप में सहअस्तित्व ही है। सहअस्तित्व अपनी महिमा के रूप में प्रभावशील और नित्य वर्तमान है। सहअस्तित्व अपने वैभव के रूप में व्यापक में अनंत है, जिसको जानने-मानने वाला मानव है। जो कुछ भी अस्तित्व है उसी में, से, के लिए सम्पूर्ण नामकरण हो पाता है। वांङ्गमय में नामों के साथ ही वस्तुओं को इंगित करने की सहज व्यवस्था है। सत्य इंगित हो जाना ही वांङ्गमय की प्रामाणिकता है। और वांङ्गमय कर्ता की प्रामाणिकता है। इसी विधि से प्रामाणिकता को पहचानने की अपेक्षा सफल हो पाती है।

अस्तित्व अपने में स्थिर है इसका प्रमाण वर्तमान ही है। वर्तमान अधिक-कम और अभाव रूपी उपाधियों से मुक्त है। वर्तमान में ही प्रमाण, जागृत मानव द्वारा मानव से और मानव में भी प्रकाशित होने का क्रम है। इसी क्रम में मानव में भी समझ स्पष्ट होती है वह वर्तमान में ही प्रमाणित होना पाया जाता है। मूलतः अस्तित्व नित्य वर्तमान होने के कारण वर्तमान अपने में स्थिति, गति, स्पंदन, आशा और आनंद की अभिव्यक्ति है। ये सभी तथ्य मानव को सहज रूप में अध्ययनगम्य, व्यवहारगम्य व अनुभवगम्य हैं, इसकी निरंतरता होना पाया जाता है। जागृत

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