की स्थिति व गति अविभाज्य है। अनंत ग्रहगोल, अणु-परमाणु, रचना और विरचना, विकास, जागृति और जागृति क्रम में जो सम्पूर्ण वस्तुएं हैं यह सब स्थिति और गति पूर्वक वर्तमान है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि अस्तित्व स्थिर होना सहज है और विकास और जागृति निश्चित है। धर्म अपने में विकास और जागृति सहज अभिव्यक्ति है। व्यवस्था, इसका मूल प्रमाण है।

प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी है। पदार्थावस्था का धर्म अस्तित्व के रूप में प्रतिपादित है। पदार्थावस्था वर्तमान नित्य है चाहे ताप परम स्थिति में क्यों न हो। जैसे सूर्य बिम्ब में निहित जितने भी पदार्थ हैं परम तप्त अवस्था में रहते हुए उसका नाश नहीं हो पाता। उसमें भी विकास का भ्रूण समाए रहने के कारण ही वह परिणाम बीज सम्पन्न है। इसी सूत्र से सूर्य बिम्ब भी कालान्तर में सूर्य बिम्ब के निश्चित परमाणु में अपने में सुदृढ़ और भारी नाभियों से सम्पन्न होकर ठोस होने की संभावना बनी ही है। पदार्थावस्था की वस्तुएं ठोस व विरल रूप में देखने को मिलती हैं यह अपने में समृद्ध होकर रासायनिक क्रिया-प्रक्रिया में संलग्न होते हैं तब रस-रचना कार्य सम्पन्न हो पाता है। अस्तित्व अपने में सम्पूर्ण होने के क्रम में सहअस्तित्व सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में वर्तमान है। सहअस्तित्व में ही परमाणु में विकास और गठन पूर्णता तथा उसकी निरंतरता है। ऐसा गठनपूर्ण परमाणु जीवन पद में संक्रमित प्रतिष्ठित रहता है साथ ही अक्षय बल-शक्ति सम्पन्न रहता है। फलस्वरूप अणुबंधन, भारबंधन से मुक्ति तथा आशा,विचार, इच्छा बंधन में प्रवृत्ति होना पाया जाता है। ऐसा जीवन परमाणु अपने सहज गति पथ के साथ एक कार्य गति पथ को स्थापित कर लेता है। यह कार्य गति पथ उसकी आशा के अनुरूप होता है। यही जीवन पुंज अथवा सूक्ष्म शरीर के नाम से भी जाना जाता है। स्वयं जीवन अपने कार्य गति पथ सहित एक आकार होना स्वाभाविक है।

ऐसे आकार वाली रचना जो जड़ प्रकृति से प्राण कोशाओं से रचित रचना है सहअस्तित्व सहज रूप में पूरक विधि से संयोग सम्पन्न होती है। ऐसे रचना कार्य का प्रस्तुति रूप जीव शरीर व मानव शरीर के रूप में वर्तमान में देखने को मिलता है। ऐसे शरीरों में से जीवन के आशानुरूप सहज व अनुकूल शरीर को संचालित करना आरंभ करता है। इस प्रकार विकास विधि से गठन पूर्ण परमाणु, चैतन्य पद व जीवन ही जागृति पूर्वक अनुभव प्रमाणों को मानव परम्परा में प्रमाणित करता है, वैभवित रहता है। पहले जड़ प्रकृति में ही रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना होती है। यह समझ में आया है। इनमें से रासायनिक रचना के रूप में मानव शरीर भी होना सर्वविदित है। यह गर्भाशय में रचित होता है। गर्भाशय के बाहर होने के उपरान्त पोषण-संवर्धन होना भी

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