स्पष्ट है। ऐसे मानव शरीर को गर्भाशय में ही रचना संपन्न होने के उपरान्त जीवन द्वारा संचालित करना हो पाता है।
इस प्रकार इन दोनों का सहअस्तित्व रूप में कार्यरत होना पूरक विधि सहज है। जीवन जागृति सहज परम्परा में समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व लक्ष्य स्वीकृत है। मानव लक्ष्य जीवन जागृति के उपरान्त ही सार्थक होना पाया गया।
जीवन और शरीर की संयुक्त परम्परा में ज्ञानेन्द्रियों का कार्य सम्पन्न होना सहज है। कर्मेन्द्रियों का आरंभिक क्रियाकलाप (अथवा सामान्य लक्षण) प्राणावस्था में भी सम्पन्न होता है। ज्ञानेन्द्रियों का कार्यकलाप जीवन्तता पूर्वक ही सम्पन्न हो पाता है। जीवन के योग में ही शरीर में जीवन्तता का प्रमाण वर्तमान है। इस क्रम में अंग और अवयवों के रूप में रचित शरीर रचनाओं में से मेधस भी एक प्रधान रचना रूपी अवयव और तंत्र है। यह अवयव सर्वाधिक शरीर रचना के शिरोभाग में होना देखा जाता है। इन्हीं मेधस पर जीवन सहज आशा, विचार, इच्छा, संकल्प, अनुभवों और प्रामाणिकताओं को प्रमाणित करना मानव परम्परा में स्पष्ट है। इस विधि से प्रत्येक मानव जीवन व शरीर के संयुक्त रूप में कार्यरत रहते हुए जानने-मानने, पहचानने व निर्वाह करने का क्रियाकला मानव सहज रूप में प्रमाणित होता है। इसमें से जानना-मानना मौलिक है। जानने-मानने का क्रियाकलाप जागृति का प्रमाण है। जीवन ही जागृति पूर्वक सम्पूर्ण क्रिया को समाधान के रूप में अभिव्यक्त करता है। जानने-मानने की वस्तुएं परम सत्य रूपी सहअस्तित्व और धर्म ही प्रधान हैं।
धर्म अपने स्वरूप में “त्व” सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रत्येक एक में देखा जाता है। ऐसा धर्म पदार्थावस्था में अस्तित्व, प्राणावस्था में अस्तित्व सहित पुष्टि, जीवावस्था में अस्तित्व, पुष्टि सहित आशा एवं मानव में अस्तित्व, पुष्टि व आशा सहित सुख जागृति पूर्वक प्रमाणित होना पाया जाता है। भ्रमित अवस्था में भी सुख सहज आशा बनी रहता है। समाधान = सुख। समस्या = दुख। अस्तित्व में किसी समस्या का स्रोत न रहते हुए भी मानव जब तक जीवों के सदृश्य जीने के लिए अपनी कर्म स्वतंत्रता व कल्पनाशीलतावश प्रयास करता है तब तक उसका समस्या से पीड़ित होना पाया जाता है। मानव सहज व्यवस्था मानवत्व सहित ही सम्पन्न हो पाती है। यही अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र है। मानवत्व की व्याख्या अखंड समाज व सार्वभौम व्यवस्था ही है। अखंड समाज का आधार “मानव जाति एक” के आधार पर संबंधों की पहचान एवं मूल्यों के निर्वाह क्रम में सम्पन्न होता है और प्रमाणित होता