देना स्मृति का वैभव है। यही जीने की कला है। सत्य निरंतर वर्तमान है। वर्तमान में अनुभव उसकी निरंतरता और उसकी अभिव्यक्ति संप्रेषणा श्रुति स्मृति है। उसे जीने की कला में विभिन्न विधाओं, आयामों, कोणों व दिशाओं में सार्थक बना लेना स्मृति श्रुति है। वर्तमान में अस्तित्व सहज वैभव होना, मानव अस्तित्व में अविभाज्य होना इसका अनुभव सहज अभिव्यक्ति स्वयं में श्रुति, स्मृति है। इसे अभिव्यक्ति सहज संप्रेषणा व जीने की कला में प्रमाणित कर पाना स्मृति एवं श्रुति है। अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व है, यह अभिव्यक्ति संप्रेषित होना श्रुति है अर्थात् अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व के रूप में वर्तमान रहना, सहअस्तित्व में स्वयं को अविभाज्य रूप में अनुभव व प्रमाणित करना यह श्रुति, स्मृति है। यही परम जागृति है। इसे जीने की कला में विविध परिस्थितियों के साथ व्यवहृत कर लेना यह श्रुति स्मृति है। सहअस्तित्व में परमाणु में विकास एक सहज प्रक्रिया है। इसके प्रति जागृति विकास को एक दृश्य के रूप में देख लेना जागृति है। देख लेने का तात्पर्य समझ लेना ही है जिसको प्रमाणित करना श्रुति स्मृति है। उसे शिक्षा-संस्कार व्यवस्था में सम्बद्ध करना जीने की कला श्रुति व स्मृति है। जैसे विकास के क्रम में उन-उन के “त्व” सहित व्यवस्था के रूप में जानना- मानना, पहचानना- निर्वाह करना उस विकास के क्रम में पूरकता नियमों को अनुभव करना, प्रमाणित करना श्रुति स्मृति है और जीने की कला में पूरकता को व्यवहार रूप देना श्रुति स्मृति है।
परमाणु में विकास रूपी गठन पूर्ण परमाणु को चैतन्य इकाई के रूप में जीवन पद में पहचानना, जानना-मानना, जीवन सहज कार्य को प्रमाणित करना श्रुति स्मृति है। उसे व्यवहार में संबंधों को पहचानना, मूल्यों का निर्वाह करना, मूल्यांकन, उभय तृप्ति अनुभव है। इसे संप्रेषित करना स्मृति श्रुति है। जीवन जागृति पूर्वक ही वर्तमान सहज सत्य को प्रमाणित करना श्रुति स्मृति है। उसे व्यवहार में सार्थकता देना यह जीने की कला श्रुति स्मृति है। जैसे पूरकता नियम सहज उत्पादन, न्यायपूर्ण व्यवहार, समाधान मूलक सम्पूर्ण व्यवस्था यह जीने की कला यही श्रुति व स्मृति है। सहअस्तित्व में अनुभव मूलक विधि से सम्पूर्ण स्मृतियों का श्रुतिमूलक होना ही मानव परम्परा का नित्य शुभ है।
3. मेधा 4. कला
मेधा :- (1) स्मृति में धारक वाहक क्रिया। (2) कला को साक्षात्कार करने वाली चिंतन क्रिया।