पाया जाता है। सर्व मानव में मानवीयता स्वीकार है। उपभोक्ता संस्कृति विधि से मानव के संस्कार को आकलन करने का उद्देश्य संघर्ष का आधार बनाया गया इससे मानव मानवत्व सहज दिशा से वंचित ही रह गया। अस्तु, मानवीयता, मानवीयता पूर्ण संस्कार, जागृति, जागृति पूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करना समीचीन हो गई है। इसी का नाम है मध्यस्थ दर्शनवाद, शास्त्र, योजनाएँ।

तन, मन, धन का सदुपयोग विधि से वस्तु का उपयोग विधि से वस्तु का मूल्यांकन विनिमय के लिए सुलभ होते हुए परिवार में उपयोग, समाज में सदुपयोग, व्यवस्था में प्रयोजनशील होने की दिशा स्पष्ट हो गयी है। इसका स्पष्टीकरण पहले भी किया जा चुका है।

(1) समझदारी पूर्वक तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी निश्चित ध्रुवों के साथ दिशा निर्धारित होना स्पष्ट हुई है। इसलिए सर्वप्रथम समझदारी उसके अनंतर कार्यविधि के रूप में दिशा, उसका फल परिणाम।

(2) समझदारी की पुष्टि में होना पाया गया है। ऐसा निश्चित करना मेधा का कार्य है यह निश्चय के रूप में चिन्हित होता है। इसे जीवन में चरितार्थ करने के लिए क्रिया प्रणाली को अपनाते है। यही निश्चित दिशा के रूप में कार्य गति; विचार गति का होना पाया जाता है फलस्वरूप इसकी सफलता मानव कुल में प्रमाणित होती है।

इन वास्तविकताओं को हर व्यक्ति या सर्वाधिक व्यक्ति स्वीकारता ही है। इसके लिए आवश्यकीय समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेंदारी में पारंगत होने की आवश्यकता है। ऐसी समझदारी जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण के रूप में स्पष्ट है। उल्लेखनीय तथ्य यही है कि मानव की आकाँक्षा अथवा शुभाकाँक्षा समीचीनता के बीच मानव परम्परा ही प्रमुख सार्थक स्थिति और गति है। इसका तात्पर्य यही हुआ कि मानव सहज परम्परा बहुआयामी होना स्पष्ट किया जा चुका है। ऐसे सभी आयामों में लक्ष्य दिशा सार्थकता का निर्धारण विज्ञान और विवेक संगत विधि से ही संपन्न हो पाना पाया गया है। सत्य मूलक, समाधान मूलक स्मृतियाँ, न्याय और नियम मूलक स्मृतियाँ अनुभव मूलक विधि मानव में, से, के लिए प्रमाणित होना पाया जाता है। शुभाकाँक्षाएँ जीवन सहज कल्पना में होता ही है। उसकी सार्थकता प्रमाण रूप में परम्परा में प्रमाणित होना तभी होता है जब परम्परा स्वयं, सार्थक ज्ञान, सार्थक दर्शन और सार्थक आचरण को जाने-माने, पहचाने-निर्वाह करे। यह सर्वमानव में, से, के लिये अथवा लोकव्यापीकरण के लिए अथवा सर्वसुलभ होने के लिए मानवीय शिक्षा संस्कार ही एक मात्र शरण है। यही जागृत शिक्षा है। इसी में अस्तित्व सहज सहअस्तित्व का अध्ययन, सूत्रों,

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