एक समृद्ध मेधस युक्त शरीर को संचालित करना तथा मानव शरीर व जीवन के संयोग से जागृति को प्रमाणित करना ही उद्देश्य है। इसी क्रम में मानव विकल्पात्मक विश्व दृष्टि को विकसित करना आवश्यक रहा। इसी तथ्यवश अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित विश्व दृष्टि का लोक व्यापीकरण विधि से विवेक और विज्ञान का मानव व्यवहार में प्रमाणित होना ही विकल्प का प्रयोजन है।
मानव व्यवहार का तात्पर्य और प्रमाण है अखंड समाज और सार्वभौम व्यवस्था का वर्तमानित होना। “जीवन-विद्या” का लक्ष्य स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान है। जीवन-विद्या में पारंगत अधिकांश व्यक्तियों में इस प्रभाव को देखा गया है।
दूसरे चरण में मानववाद है जो अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था को लोक व्यापीकरण करने के कार्यक्रम को प्रस्तुत करता है। इसके अध्ययन से मानव संस्कार सुलभ होता है। इसके अवगाहन से मानवीय संस्कार से देव मानव व दिव्य मानव कोटि का संस्कार स्वयं स्फूर्त होता है।
इसकी पुष्टि के लिए जीवन सहज कार्यकलापों को परस्पर परीक्षण निरीक्षण पूर्वक जागृत होने की विधि को सर्व सुलभ करता है। जिससे निःश्रेयस की आदिकालीन वांछा रही है वह भ्रम-मुक्ति के रूप में सुलभ हो गया है। जिसका लोकव्यापीकरण करना शुरु किया है।
अभ्युदय ही सर्वतोमुखी समाधान के रूप में सार्वभौम व्यवस्था के रूप में व्यवहारान्वित होता है। ऐसा सर्वतोमुखी समाधान सर्वसुलभ होने के लिए विवेक व विज्ञान का सम्मिलित रूप में मानवीय शिक्षा-संस्कार के रूप में प्रमाणीकरण की आवश्यकता है।
विवेक व विज्ञान में सामरस्यता ही सर्वतोमुखी समाधान और न्याय सुलभता का सहज स्रोत है। यह प्रत्येक व्यक्ति में समीचीन है। जन जीवन में जागृति के लिए विज्ञान व विवेक सम्मत शिक्षा क्रिया का लोकव्यापीकरण आवश्यक है। और न्याय, धर्म, सत्य को स्वीकार करने वाली क्रिया के रूप में मेंधा जीवन सहज रूप में सार्थक होता है यह प्रत्येक व्यक्ति में समीचीन है।
कला का तात्पर्य है सार्वभौमता अखंडता के लोकव्यापीकरण करने का क्रियाकलाप। यही प्रत्येक मानव को मानवीयता आचरण पूर्वक मानव परिवार में भागीदार होने ग्राम परिवार व विश्व परिवार में भागीदार होने का सूत्र और व्याख्या है। ग्राम व विश्व परिवार में व्यवस्था सूत्र ही सार्वभौमता को प्रमाणित करता है। यही मानव परम्परा सहज जीने की कला है। ऐसी कला का लोकव्यापीकरण करना ही कला का तात्पर्य है। यह हमारा संकल्प है।