सहज ही पहचानता है। यह कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों में परावर्तित जीवन का वैभव है। यह परावर्तन विधि सहअस्तित्व सहज है। समृद्ध मेधस युक्त रचना के उपरान्त ही (अथवा समृद्ध मेधस युक्त शरीर को) जीवन सहज ही जीवन्तता प्रदान करता है। जीवंतता प्रदान करने की प्रक्रिया यह है कि जीवन अपने जीने की आशा सहज प्रभाव से मेधस को प्रभावित करता है। मेधस के द्वारा ज्ञानवाही विधि से सम्पूर्ण शरीर में जीवंतता का प्रभाव क्षेत्र बना ही रहता है। मेधस पर जीवन का संकेतों के रूप में जो प्रभाव प्रभावित रहता है वही सर्वाधिक पाँचों ज्ञानेन्द्रियों द्वारा कार्यशील प्रवर्तनशील देखने को मिलता है। जीवन अपने में गठन पूर्ण परमाणु है एवं चैतन्य पद में संक्रमित इकाई है। यही जीवन प्रतिष्ठा के रूप में वैभवित है। जागृति पूर्वक जीवन अपने दृष्टा पद का प्रयोग करता है और अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन करता हुआ ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों का द्रष्टा है। यही शरीर के साथ संज्ञानशीलता का भी तात्पर्य है। इच्छानुसार इंद्रिय कार्य करना ही इन्द्रिय व्यापार है अथवा इंद्रिय कार्यकलाप है। इस प्रकार जागृत मानव अपने ही स्वरूप को, जीवन वैभव को शरीर कार्यकलाप के साथ द्रष्टा पद के वैभव को मूल्यांकन कर सकता है। मूल्यांकन क्रम ही जीवन प्रकाश की कांति है। इस रूप में जागृति सहज प्रभाव क्षेत्र प्रमाणित होता है। इसका तात्पर्य यह है कि जीवन का प्रभाव क्षेत्र ही कांति के नाम से इंगित होता है।
अस्तित्व में प्रत्येक “एक” का प्रभाव क्षेत्र उससे अधिक होता है। जैसे एक परमाणु जितना भी अपनी लम्बाई, चौड़ाई व ऊंचाई सहित है उससे अधिक क्षेत्र में वह कार्य प्रभाव रहते हुए देखने को मिलता है क्योंकि एक दूसरे के बीच में रिक्त स्थली रहता है। यह इस बात का प्रमाण है कि परमाणु में अपना प्रभाव क्षेत्र परमाणु में निहित अथवा कार्यरत सम्पूर्ण अंशों का जितना घन होता है उससे अधिक अवकाश में, अपना कार्य प्रभाव क्षेत्र बनाए रखता है। इसी का दूसरा प्रमाण परमाणु में निहित प्रत्येक अंश, परस्पर एक निश्चित दूरी में रहते हुए निश्चित व्यवस्था को व्यक्त करते हैं। ऐसे परमाणुओं से भौतिक और रासायनिक अणु और रचनाएँदेखने को मिलती हैं। परमाणु विकसित होकर गठन पूर्ण होता है। चैतन्य इकाई ही जीवन पद है। ऐसे जीवन ही जागृति पूर्वक क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता को विश्राम और प्रमाणिकता के रूप में प्रभावित करते है। यही परमाणु में विकास और जागृति वैभव है। अर्थात् जीवन का मूल रूप भी गठन पूर्ण परमाणु है। इन सब घटनाओं, महिमाओं का दृष्टा जीवन ही है। जीवन का अद्भुत वैभव उसी का कार्य क्षेत्र और प्रभाव क्षेत्र है। चैतन्य प्रकृति रूपी जीवन अक्षय बल व अक्षय शक्ति सम्पन्न होने के कारण आशा, विचार, इच्छा, संकल्प व प्रामाणिकता के रूप में अपने प्रभाव क्षेत्र को बनाए रखना हर व्यक्ति में प्रमाणित है।