5. कान्ति 6. रूप
कान्ति :- कांति का तात्पर्य प्रकाश से है।
रूप :- आकार, आयतन, घन।
कांति का तात्पर्य जीवन प्रकाश से है। अस्तित्व ही रूप है इसलिए जीवन प्रकाश में सम्पूर्ण रूप दिखते हैं हर रूप में प्रकाशमानता रहता है। अस्तित्व सीमित असीमित रूप ही वर्तमान है। सत्ता व्यापक (असीमित) रूप में है। सत्ता में संपृक्त सम्पूर्ण प्रकृति सभी ओर से सीमित रूप में दिखती है। देखने का तात्पर्य समझने से है। सभी ओर से सीमित प्रकृति एक-एक के रूप में है। इसका रूप, गुण, स्वभाव, धर्म सहज अविभाज्य होना पाया जाता है। यह जीवन प्रकाश में ही मानव को समझ में आता है। जबकि हर एक-एक अपने स्वरूप में प्रकाशित रहता ही है।
जीवन प्रकाश का परावर्तन विशालता और प्रभावशील है। इसका तात्पर्य मानव जितनी विशालता तक निर्भ्रम है वहाँ तक परावर्तन का प्रभाव रहता है। जागृत होने का तात्पर्य जानने-मानने से है और जानने-मानने का तात्पर्य अनुभव से है। अनुभव मूलतः जानने-मानने का तृप्ति बिंदु है, जीवन प्रकाश में अस्तित्व ही, सम्पूर्ण वस्तु रूप है। अस्तित्व में ही सम्पूर्ण वस्तु अविभाज्य है। जीवन जागृति की महिमा ही जीवन प्रकाश है। व्यापक व अनंत अस्तित्व ही, जीवन में दृश्य के रूप में स्पष्ट होता है। जागृत मानव ज्ञान, विज्ञान व विवेक विधि से क्यों, कैसे, कितना का दृष्टा होता है जिससे उसकी विवेचना व विश्लेषण सहज होता है। अस्तित्व में अनुभव मूलक प्रणाली ही सहज रूप में अनुभव, चिंतन व विश्लेषण जागृति की प्रक्रिया है। फलतः अस्तित्व कैसा है? यह समझ में आता है। यह व्यापक में संपृक्त अनंत सहज सहअस्तित्व है। यही पदार्थ, प्राण जीव व ज्ञानावस्था सूत्रित व्याख्यायित है।
मानव जीवन और शरीर के संयुक्त साकार रूप में है। सम्पूर्ण शरीरों का जीवन्तता पूर्वक कार्य व्यवहार करना पाया जाता है। जीवन ही इंद्रियों का द्रष्टा है। यह प्रत्येक मानव में प्रमाणित है। यह प्रमाण परस्परता में भी प्रमाणित है। प्रत्येक मानव जीवंतता पूर्वक जीता हुआ और निर्जीवन्तता पूर्वक मरा हुआ शरीर के रूप में पहचाना जाता है, तदनुसार मानव निर्वाह भी करता है। जैसे जीवन मानव के जीते रहने के अधिकार को परस्पर प्रकारान्तर से स्वीकारता है। यही जीने देने का प्रधान सूत्र है। जीता हुआ आदमी जीना चाहता ही है। जीवित आदमी को देखने वाला आदमी भी जीवित रहता है। इस प्रकार प्रत्येक मानव जीवंतता पूर्वक जीवित मानव को