को मिला नहीं। जो कुछ भी मिला है वह यह कि हर वस्तु विद्यमान है, गतिमान है और इसी के साथ प्रकाशमानता सहअस्तित्व सहज वैभव है।

हर वस्तु अपने स्वरूप में सीमित होना विद्यामानता का द्योतक है। हर वस्तु अपने ही अनंत कोणों की ससम्मुखता में दूसरे इकाई के साथ-साथ दूसरे इकाई पर प्रतिबिंबित रहना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी क्रम में सौर व्यूह एक दूसरे ग्रह-गोलों पर ससम्मुखता विधि से प्रतिबिंबित रहना उन-उन के प्रकाशमानता का साक्षी है। इसी प्रकार अंनत सौर व्यूह अनेक आकाशगंगा के नाम से ग्रह-गोल नक्षत्रों को पहचान पाते है। जिसको हम पहचान भी नहीं पाये हैं ये सब अपने अपने स्थिति में प्रकाशमानता प्रतिबिंब सहज वैभव के रूप में है ही। होने का अर्थ ही अस्तित्व है। अस्तित्व का ही दूसरा नाम स्थिति है। हर वस्तु अपने स्थिति-गति के साथ ही प्रतिबिंबित रहते है। प्रत्येक एक-एक में स्थितिगति अविभाज्य है।

यहाँ इस मार्मिक मुद्दे को स्मरण दिलाने का तात्पर्य यही है कि छोटे से छोटे परमाणु अंश एक दुसरे को पहचानते है इसका साक्ष्य निश्चित संख्यात्मक परमाणु अंशों से गठित अथवा सम्मिलित कार्य रूप को परमाणु नाम से इंगित किया जा रहा है। सभी परमाणु इसी स्वरूप में विद्यमान गतिमान प्रकाशमान है। परमाणु के मूल वस्तु परमाणु अंश एक दूसरे को पहचानने के आधार पर ही निश्चित कार्य को करने में प्रवृत्त निष्ठा उसकी निरंतरता का होना समझ में आता है। ये स्वयं परमाणु अंशों की प्रकाशमानता के साथ ही एक दूसरे के व्यवस्था के रूप में निश्चित आचरण को प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति उन-उन परमाणु अंशों में ही निहित रहना स्वाभाविक है। इन परमाणुओं का अद्भुत तथ्य यह भी है कि ये नित्य प्रकाशमान है।

परमाणुओं के रूप में कार्यरत परमाणु अंशों के संख्या भेद से उन-उन का आचरण भिन्न-भिन्न होता हुआ भी समझ में आता है क्योंकि लोहा में लोहत्व के रूप में जो आचरण है उसका मूल स्रोत उस लोहा के रूप में कार्यरत परमाणु ही है। लोहा के रूप में जितना द्रव्य है उन सब के मूल में निश्चित एक जाति परमाणुओं का होना पाया जाता है क्योंकि परमाणु की अणु के रूप में अणु अणुपिंड के रूप में रहना पाया जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक प्रजाति के पिंडों में निश्चित प्रजाति के परमाणु समाहित रहना स्पष्ट हो जाता है। इसी स्पष्टता के साथ एक दूसरे को पहचानने वाला क्रम वैभव परमाणु अंशों से ही स्रोत रूप में निहित रहना भी जागृत मानव को समझ में आता है। इसी के साथ यह भी समझ में आता है हर परमाणु अंश में ही व्यवस्था के रूप में कार्यरत रहने की प्रवृत्ति समायी रही है। इस विधि से छोटी से छोटी मात्रा जो निश्चित मात्रा है

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