मानव परम्परा में परस्पर कांति का अनुभव पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्थाओं में प्राकृतिक छटा सौंदर्य के रूप में अनुभव किया जाता है। यह प्रकाशमानता का ही अनुभव है। प्रकाशमानता सभी अवस्था, पदों में रूप सहज विधि से ही सम्पन्न होना पाया जाता है। हर रूप के सात सौंदर्य कांति के रूप में गण्य होता है। सौंदर्य का सत्यापन करने वाला इकाई मानव ही है। उसमें भी व्यवस्थात्मक सौंदर्य को सत्यापित करने वाला मानव ही है। मुख्य मुद्दा व्यवस्थात्मक सौंदर्य ही कांति है। इसे जागृति पूर्वक ही हर मानव पहचानता है। यही कांति का वैभव है जागृत मानव में व्यवस्था सहज विधि से सुख पाना बन जाता है।

कांति का दूसरा नाम “छवि” है छवि का तात्पर्य अपने सौंदर्य को अथवा स्वसौंदर्य को ससम्मुखता में प्रतिबिंबित करने के अर्थ में सार्थक होना पाया जाता है। मनुष्येत्तर तीनों अवस्थाओं में व्यवस्था के रूप में सौंदर्य विद्यमान है ही। व्यवस्थात्मक कांति को, सौंदर्य को प्रभाव को जागृत मानव ही मूल्यांकित कर पाता है। मूल्यांकित करने का क्रिया स्वयं सुख का स्रोत हो पाता है। इसी विधि से कांति का प्रयोजन हर रूप हर अवस्था, हर पद के साथ मूल्यांकित होना पाया जाता है अस्तु, यह निष्कर्ष निकलता है रूप और कांति अविभाज्य है व्यवस्था के रूप में वैभव हैं। सहअस्तित्व प्रयोजन है, त्व सहित व्यवस्था समग्र व्यवस्था में भागीदारी अक्षुण्ण है। इस प्रकार रूप और कांति का प्रयोजन विदित होता है।

7. निरीक्षण 8. गुण

निरीक्षण :- (1) अनुभवमूलक दर्शन एवं उसके प्रकटन की संयुक्त चिंतन-चित्रण क्रिया।

गुण :- (1) सापेक्ष शक्तियाँ। (2) सम-विषम - मध्यस्थ गतियाँ। विषम गुण = आवेशित गति। समगुण = स्वभाव गति। मध्यस्थ गुण = व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी रूपी गति (स्वभाव गति की निरंतरता)। (3) स्वभाव गति अथवा अपेक्षित गति का प्रकाशन।

इच्छाएँ अपने आप में रूचि मूलक, मूल्य मूलक व लक्ष्य मूलक प्रणाली से प्रकाशित प्रमाणित होती हैं। इच्छाएँ ईक्षण सहित छवि की महिमा के अर्थ में मानव के क्रियाकलापों में सार्थक अथवा चरितार्थ होती हैं। इंन्द्रियों का दृष्टा है जीवन। जीवन भ्रमित होने के कारण इंन्द्रिय सन्निकर्षात्मक क्रियाकलाप में जीवन अपने दृष्टा पद को जीने की आशा, आस्वादनापेक्षा के आधार पर सम्मोहन और आवेश पूर्वक इन्द्रिय सन्निकर्ष में तद्रुप स्वीकार लेता है। तद्रुपता का तात्पर्य मैं स्वयं इन्द्रिय हूँ। इस प्रकार की स्वीकृति में स्वयं स्वअस्तित्व भुलावा हो जाने से है।

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