अस्तु, जीवन ही जीवन को, जीवन से, जीवन के लिये बेहोशी में सुख पाने की स्वीकृति अर्थ में स्वयं की विस्मृति स्वीकृत होना पाया जाता है। परिणामस्वरूप जीवन भ्रमित रहना पाया जाता है। इस प्रकार जीवन आस्वादनापेक्षा और इन्द्रिय सन्निकर्ष में सीमित हो जाता है। यही पशुवत जीने का आधार और प्रवृत्ति है। जबकि जागृति पूर्वक जीवन इंद्रिय सन्निकर्ष का दृष्टा होता ही है। न्याय, धर्म, सत्यपूर्वक इन्द्रिय सन्निकर्षों को उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशील विधि से प्रमाणित करने का कार्यक्रम स्वयं स्फूर्त विधि से होता ही है, इस तथ्य को पहले भी स्पष्ट किया जा चुका है।
व्यवस्था ही वर्तमान में विश्वास है जो अभय का सकारात्मक रूप है। अस्तित्व नित्य व्यवस्था व वर्तमान होने के कारण अस्तित्व में मानव अविभाज्य होने के कारण मानव में, से, के लिए व्यवस्था नित्य समीचीन है। जीवन सहज व्यवस्था को जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने के लिए उन्मुख रहता है अर्थात् प्रवर्तित रहता है।
व्यवस्था का आधार मूल्य मूलक, लक्ष्य मूलक विधि है। यह सहअस्तित्व सहज है। सहअस्तित्व नित्य प्रभावी है। अस्तित्व ही सहअस्तित्व है यही मूल्य मूलक, लक्ष्य मूलक प्रवर्तन कार्य व्यवहार आचरण व्यवस्था का आधार है। मूल्य संबंधों के आधार पर हैं। संबंध सहअस्तित्व के आधार पर स्पष्ट हैं। सत्ता में प्रकृति का संपृक्त अविभाज्य सामरस्यरत होना सार्वभौमता व अखंडता का आधार है। साथ ही विकास में निश्चयता है और अस्तित्व की नित्य वर्तमानवश स्थिरता वर्तमान है। इसलिए मानव का अपनी ही जागृति सहज परम्परा के रूप में अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था को प्रमाणित करना नित्य समीचीन है। मानव सहज निरीक्षण यही है। अस्तु, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी को सर्वतोमुखी समाधान के रूप में; अखंड समाज में भागीदारी को सहअस्तित्व में, मानवीयता पूर्ण आचरण को वर्तमान में विश्वास के रूप में, परिवारगत उत्पादन को आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने से समृद्धि को मानव प्रमाणित करता है। यही जागृत मानव का प्रमाण और वैभव है।
9. संतोष 10. श्री
संतोष :- (1) अभाव का अभाव (2) आवश्यकता से अधिक उत्पादन सहित विवेक सम्मत विज्ञान विज्ञान सम्मत विवेक रूपी पूर्ण विचार शैली में परिपक्वता और योजना और कार्ययोजना में प्रमाणित होने के लिए तत्परता। (3) विचार सहज आवश्यकता से अधिक समझ, आचरण