के रूप में प्रमाणित करने से अधिक विचार, व्यवस्था में भागीदारी करने से अधिक आचरण, जागृत मानव का तृप्ति सहज स्रोत और इसकी अक्षुण्णता। (4) संकल्प और चित्रण की पूर्ण सामरस्यता और चिंतन तथा चित्रण की पूर्ण सामरस्यता सार्थक इच्छाओं के रूप में होना प्रमाणित होता है।

श्री :- समृद्धि या समृद्धि की निरन्तरता का स्वीकृति।

संतोष जीवन मूल्यों में से एक सहज प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। जीवन मूल्य अपने में सुख, शांति, संतोष, आनंद हैं। जिसमें से संतोष चित्त में होने वाली संतुष्टि का नाम हैं। चिंतन जीवन सहज प्रयोजनों को प्रतिपादित व मूल्यांकित करने की क्रिया है। मानव ही प्रकारान्तर से मूल्यांकन करने योग्य इकाई है यह प्रमाणित होता है। लक्ष्य मूलक प्रणाली में प्रवर्तित रहना ही संतोष सहज अभिव्यक्ति है। ऐसी अभिव्यक्ति में समृद्धि समझ, विचार, लक्ष्य, निर्णय, कार्य, दिशा के विधाओं में होना पाया जाता है। सभी समृद्धियों को पहले स्पष्ट किया जा चुका है इनका धारक-वाहक मानव ही है।

संतोष जागृत जीवन में नित्य भाव व सर्वभाव सहज अक्षुण्णता को जानने-मानने पहचानने-निर्वाह करने के क्रम में प्रयोजन सहित सार्थकता है। जीवन में जानने मानने के फलस्वरूप अवधारणा का अनुभव क्रम में चित्त में साक्षात्कार और चित्रण के रूप में होना सहज है। यही अभाव का अभाव सर्वतोमुखी सहज समृद्धि है। इसका तात्पर्य नित्य भाव अथवा सर्वभाव की सहज सुलभता से है। संतोष, प्रत्येक मानव का जीवन सहज अपेक्षा, जीवन सहज कामना व जागृति पूर्वक अभिव्यक्ति है।

संतोष मानव सहज नित्य भाव, नियम, नियंत्रण, न्याय, संबंध, समाधान की अभिव्यक्ति, संप्रेषणा व प्रकाशन है। यह जीवन विद्या (ज्ञान) के आधार पर मानव में स्पष्ट होता है। इसी क्रम में मानव सतत प्रयासशील रहा है। ‘श्री’ संपन्न होना प्रत्येक मानव में एक अपेक्षा है। ‘श्री’ संपन्न होने का तात्पर्य यशस्वी होने से है। यशस्वी होने का तात्पर्य स्वतंत्रता और स्वराज्य में प्रमाणित होने से है। यश अक्षुण्णता के रूप में सार्थक होना पाया जाता है। अक्षुण्णता अपने में समझदारी, सहअस्तित्व, समाधान, समृद्धि,अभय (वर्तमान में विश्वास) ही है। इसी को एक वाक्य में कहना बनता है कि सहअस्तित्व ही नित्य, वर्तमान, अक्षुण्ण है मानव को मानवीयता से जागृत होकर देव मानव पद में होना सहज है। मानवीयता पूर्ण मानव में यशस्वी होने का प्रवर्तन सहज है। ऐसे प्रवर्तन क्रम में संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह सहज रूप में सम्पन्न होता है और

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