यह अस्तित्व में मानव केन्द्रित चिंतन पूर्वक सफल हो पाता है। प्रत्येक मानव में जीवंतता (अर्थात् जीवन) वर्तमान है। इन्हीं के अध्ययन क्रम में जीवनगत संतुष्टि बिंदु स्वतंत्रता और स्वराज्य है। स्वराज्य व्यवस्था में सर्वतोमुखी समाधान सहज है और स्वतंत्रता में प्रामाणिकता की अभिव्यक्ति सहज है। इस प्रकार परिवार मानव के सामाजिक होने स्वयं एक व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदार होने के क्रम में सर्वतोमुखी समाधान समीचीन है।
व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी मानव परम्परा की सार्वभौमता है और उसकी निरंतरता का नित्य स्रोत है। यह जागृत जीवन सहज अभिव्यक्ति है। प्रत्येक मानव में जीवन अक्षय बल व शक्ति सम्पन्नता के रूप में विद्यमान है। इसका अभिव्यक्ति क्रम, संप्रेषणा क्रम क्रमशः अनुभव बल, विचार शैली व जीने की कला के रूप में प्रमाणित होना ही मानव परम्परा की सफलता व उसकी निरंतरता है। यही जागृति का प्रमाण है। ऐसी मानव परम्परा में ही संतोष और ‘श्री’ के लोकव्यापीकरण होने की संभावना समीचीन है।
मानव के लिए सहज रूप में संतुष्टि कल्पनाशीलता व कर्म स्वतंत्रता की तृप्ति के रूप में होती है। अस्तु, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी ‘संतोष’ का प्रमाण है और परिवार, ग्राम परिवार व विश्व परिवार, अखंड समाज में भागीदारी यशस्वी होने का सहज मार्ग है। यश श्री के रूप में जीवन संतुष्टि ही संतोष के रूप में वैभवित होता है।
11. प्रेम 12. अनन्यता
प्रेम :- पूर्णानुभूति। दया, कृपा, करूणा की संयुक्त अभिव्यक्ति। पूर्णता में रति व उसकी निरंतरता।
अनन्यता :- मानव की परस्परता व नैसर्गिकता में पूरक क्रियाकलाप। प्रमाणिकता व समाधान में निरंतरता। अविकसित के विकास में सहायक क्रिया। जागृति पूर्ण पहचान।
प्रेम ही जीवन में पूर्ण मूल्य है। अनन्यता ही प्रधान शिष्टता है। जो प्रेम को अभिव्यंजित करने में समर्थ है। प्रेममयता ही विवेक सम्पन्न एवं अभयता का अनुभव है। यह संबोधन क्रम से स्थापित सम्बंधों को ज्ञान कराता है। प्रत्येक संबंध में स्थापित मूल्य प्रसिद्ध है। प्रत्येक सम्बंधों की चरितार्थता केवल वर्तमान में विश्वास एवं सम्पूर्ण सम्बंधों की पहचान मूल्यों का निर्वाह ही है - जो जीवन का लक्ष्य और कार्यक्रम है। प्रत्येक चैतन्य इकाई जीवन पद में है, जीवन जागृति पूर्वक प्रेम और अनन्यता की दया, कृपा, करुणा के संयुक्त रूप में प्रमाणित करता है।