संबंधों में ही न्याय का प्रमाण वर्तमान होता है यही यश का आरंभिक स्वरूप है। न्याय की विशालता मानव संबंध व नैसर्गिक संबंध के रूप में वर्तमान है। स्वराज्य विधि में नैसर्गिक संतुलन अनिवार्य स्थिति है। जिसमें से नैसर्गिक संबंधों को नियंत्रण व सन्तुलन के अर्थ में नियमों को पहचानना व निर्वाह करने के रूप में सार्थक होता है। जीवन की यह अभिव्यक्ति, सार्थकता व जागृति का प्रमाण है।
“जीवन-विद्या ज्ञान” मानव सहज है अर्थात् अस्तित्व में जैसा मानव है उसका स्पष्ट अध्ययन है। अस्तित्व में मानव एक इकाई के रूप में दृष्टव्य है। मानव जीवन और शरीर के संयुक्त साकार रूप में है। जीवन शरीर को संचालित करता है इसका साक्ष्य सम्पूर्ण शरीर को जीवंत रखने के रूप में है। जीवन्त रहने का साक्ष्य ज्ञानेन्द्रियों के क्रियाकलापों में स्पष्ट होने से है।
इसी के साथ जीवन का क्रियाकलाप जानने- मानने, पहचानने व निर्वाह करने के रूप में प्रत्येक व्यक्ति में प्रमाणित है। इन्हीं चारों क्रियाओं का संयुक्त नाम जीवन संचेतना है। संचेतना का तात्पर्य है पूर्णता के अर्थ में जानना-मानना, पहचानना व निर्वाह करना।
इसलिए सर्वतोमुखी समाधान क्रम में मानवीयता पूर्ण संस्कृति-सभ्यता उदितोदित होता है। उदितोदित होने का तात्पर्य हर परिस्थितियों में मानवीय संस्कृति सभ्यता के प्रमाणित होने से हैं। फलस्वरूप सुख, सुंदर, समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक जीना प्रमाणित होता ही रहता है। फलतः प्रमाण सहज सुख अक्षुण्ण हो जाता है। यह अक्षुण्णता हर मानव में स्वागतीय रहता है। इसी विधि से जागृत परम्परा की अक्षुण्णता मानव कुल में वैभवित होना स्वाभाविक है।
मानव पंरपरा में संतोष सर्वतोमुखी समाधान और उसकी निरंतरता अभिव्यक्ति है। यही सभी विधाओं में समृद्धि, उसकी अभिव्यक्ति तथा यशस्वी होने का स्रोत है। यह जीवन जागृति पूर्वक सार्थक होता है। यह जीवन में यशस्वी, समाधानित और प्रामाणिक होने की अभीप्सा सतत सार्थक होते रहते है। मानव प्रयास विविध प्रकार से यशस्वी होने के क्रम सार्थक होना पाया जाता है यह जागृति का ही वैभव है। सर्वतोमुखी समाधान को अभ्युदय के रूप में मानव मानस सदा-सदा जागृति मूलक विधि से हर क्रियाकलाप में सार्थक होना पाया जाता है। सर्वतोमुखी समाधान सुख के रूप में नित्य सुलभ रहता ही है। प्रयास के लिए समझदारी ही स्वंय सूत्र है।