प्रेमानुभूति स्वयं स्वतंत्रता स्वानुशासन के रूप में प्रमाणित होता है। अस्तित्व में अनुभूति पूर्वक ही प्रेमानुभुति और अभिभूति प्रमाणित होता है। स्वतंत्रता जीवन का लक्ष्य है। अभिभूति ही नियम, नियंत्रण, संतुलन न्याय, धर्म, सत्य सहज विधि से पूरक होने का प्रमाण है। पूरक होने का प्रमाण मानव सम्बंधों के नैसर्गिक सम्बंधों में सार्थक होना पाया जाता है। मानव सहज मानव संचेतना का प्रमाण सहजता के आधार पर स्वानुशासन सहज ही सार्थक होना पाया जाता है। प्रेमानुभूति का प्रधान लक्षण अनन्यता है। प्रत्येक मानव अपने से विकसित के साथ अनन्यता को स्थापित करता है। यह जागृति परम्परा की महिमा है।
विकसित इकाई द्वारा अविकसित के साथ वात्सल्यादि मूल्यानुभूति सहित शिष्ट मूल्यों की अभिव्यक्ति ही उसका स्वभाव है। श्रद्धा एवं विश्वास में अनुभूति प्रेमानुभूति योग्य क्षमता को प्रदान करती है। मानवीयतापूर्ण जीवन में प्रत्येक जागृत मानव में, से, के लिए विश्वास का अनुभव करने योग्य क्षमता प्रमाणित होती है। मानवीयता पूर्ण जीवन में सर्वप्रथम अनुभव में आने वाला स्थापित मूल्य विश्वास ही है। द्वितीय मूल्य श्रद्धा है। इन दोनों का योगफल ही क्रम से, प्रेमानुभूति पर्यन्त क्षमता का निर्माण करता है। यही गुणात्मक विकास है। स्थापित मूल्यानुभूति क्रम में ही प्रेमानुभूति है यह क्रम से ममता, स्नेह, विेश्वास, कृतज्ञता, वात्सल्य, सम्मान, गौरव, श्रद्धा एवं प्रेम है। सामाजिकता में परिपूर्णता ही प्रेमानुभूति योग्य क्षमता है। स्वतंत्रता पूर्वक सामाजिकता का आचरण ही सामाजिकता की परिपक्वता है। स्वतंत्रता ही प्रेमानुभूति का प्रधान लक्षण है। प्रेमानुभूति में सहजता और प्रमाणिकता वर्तमान रहता है। अन्य सभी स्थापित मूल्य, प्रेमानुभूति में, से, के लिए सोपान है। व्यवसाय मूल्य एवं शिष्ट मूल्य, स्थापित मूल्य में समर्पित होने के लिए बाध्य हैं। अनुभव का तात्पर्य क्रम पूर्वक प्राप्तोत्पत्ति ही है। मानव में क्रमानुभूति केवल मूल्य-त्रय (स्थापित,शिष्ट, व्यवसाय एवं कला मूल्य) ही है। व्यवसाय मूल्य से शिष्ट मूल्य वरीय है। शिष्ट मूल्य से स्थापित मूल्य अति वरीय है। स्थापित मूल्य में से प्रेम पूर्ण मूल्य है। इसी सत्यता से स्पष्ट परिज्ञान होता है कि प्रेमानुभूति के अनंतर ही वास्तविकताएँ स्पष्ट होती हैं। प्रकृति सहज विधि से वास्तविकताएँ होती हैं। प्रेममयता की अनुभूति ही परम उपलब्धि है परम आनंद है और कुछ पाना शेष न हो यही प्रेमानुभूति है। प्रेमानुभूति की निरंतरता होती है।
गुणात्मक परिवर्तन के संदर्भ में, से, के लिए ही दायित्व एवं कर्तव्य प्रमाणित होते हैं। अनुभव क्षमता से सम्पन्न होने पर्यन्त दायित्व एवं कर्तव्यबोध का मूल्यांकन होता है। उसके अनंतर वह स्वभावगत होता है। अमानवीयता से मानवीयता में अनुगमन करने के लिए नियंत्रण पूर्वक