दायित्व एवं कर्तव्य प्रमाणित होता है। मानवीयता से अतिमानवीयता में अनुगमन करने के लिए छः प्रकार के स्वभाव से कर्तव्य एवं दायित्व को प्रमाणित करते हैं। धीरता से परिपूर्ण होना ही वीरता का होना है। वीरता से परिपूर्ण होना ही उदारता का होना है। उदारता से परिपूर्ण होना ही दया का होना है। दया से परिपूर्ण होना ही कृपा का होना है तथा कृपा से परिपूर्ण होना ही करुणा का होना प्रमाणित है। दया, कृपा, करुणा की संयुक्त अभिव्यक्ति ही प्रेम है।
व्यक्तित्व और प्रतिभा की चरमोत्कर्षता में ही प्रेमानुभूति होती है। प्रेम अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति एवं अव्याप्ति के दोष से मुक्त है। प्रेमानुभूति यथार्थता, वास्तविकता,सत्यता सहज प्रमाण है। प्रेमानुभूति में तन्मयता एवं अनन्यता स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। अनन्यता ही अखंड सामाजिकता का धारक-वाहकता और प्रेरकता है। सामाजिकता की वास्तविकता ही अखंडता है। प्रेमानुभूतिमयता में ही जीवन चरितार्थता एवं अभयता सिद्ध होती है।
मानव ही प्रेमी एवं प्रेमास्पद होने के अर्ह (योग्य) है। मानव ही प्रेम और जागृति ही प्रेमास्पद है। मानव ही मानव के लिए प्रेमानुभूति का सुलभ सहज परस्परता है। प्रेमानुभूति योग्य क्षमता में सामाजिकता का प्रकट होना स्वाभाविक है। प्रेम सहज स्वभाव ही मानव सहज मौलिकता है। सामाजिकता मानव का वांछित वैभव है। प्रेमानुभूति सहज विधि से अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था अक्षुण्ण रूप में मानव कुल में वैभवित होता ही है। प्रेमानुभूति पूर्ण मानव की स्वतंत्रता पूर्वक सामाजिकता की अभिव्यक्ति ही समाज के लिए उसकी उपादेयता है। प्रेमानुभूतिमयता की अभिव्यक्ति शिष्टता में अर्थात् आचरण में इंगित होती है। इंगित होना ही व्यंजना है। व्यंजना ही क्रम से भास, आभास, प्रतीति, अवधारणा एवं अनुभूति है। प्रेमानुभूति हर मानव में प्रकट होता ही है।
अनुभव सहज प्रकटन मानव परस्परता में पूर्ण विश्वास का स्रोत प्रभाव और प्रक्रिया है। प्रेमानुभूतिपूर्वक हर मानव अपने ही स्वयं स्फूर्त विधि से भाव,भंगिमा, मुद्रा, अंगहार कार्य व्यवहार और निश्चय तथा निरंतरता सहित प्रकट, व्यक्त, सार्थक होना पाया जाता है। प्रेम और अनन्यता सहज रूप में ही जागृति पूर्ण व्यक्ति में अर्थात् दया, कृपा, करुणा को हर आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्यों में सार्थक रूप में संप्रेषणापूर्वक प्रकाशित, व्यवहारित होता हुआ हर जागृत मानव सर्वाधिक उपकारी होना पाया जाता है क्योंकि वह स्वयं ही दया, कृपा, करुणा का संयुक्त स्रोत है और प्रेमानुभूति संपन्न रहता ही है। साथ ही स्वायत्त, स्वतंत्र, समृद्ध, समाधानित रहते हुए ही दया, कृपा, करुणा का प्रयोजन नियोजन प्रमाणित होना देखा गया है।