अतएव दया, कृपा, करुणा का धारक-वाहक प्रेमी पद में प्रतिष्ठा पाना स्वाभाविक है। हर प्रेमास्पद उपकारों को ग्रहण करने वाले व्यक्ति के रूप में ही और समान अर्थात् पूर्ण जागृत व्यक्ति परस्परता में समानता के अर्थ में होते है यह भी प्रेमास्पद होते है। हर मानव प्रेमास्पद होने योग्य रहने का नजरिया हर प्रेमी के मन में होता ही है। इतना ही नही नैसर्गिकता सहित प्राकृतिक संतुलन के लिए भी हर अस्तित्व प्रेमी, विकास प्रेमी, जागृत प्रेमी, जागृति सहज प्रेमी अपने जीवन शक्तियों को नियोजित करता ही है। अतएव मानव प्रेम पूर्वक सर्वाधिक उपयोगी, सदुपयोगी,प्रयोजनकारी हो जाता है। यही नित्य उत्सव का आधार है। यही अनन्यता की गरिमा है। अनन्यता कार्य व्यवहार के रूप में दृश्य होते हुए दया, कृपा, करुणा के सहज सूत्रों को प्रेममयता को व्यंजित कराती है। व्यंजना का तात्पर्य समझने समझाने से है। जैसे-अनुभव समझ में आता है इसलिए समझाने योग्य होता है। इसी आधार पर प्रमाण एवं परम्परा है। प्रेममयता ही जागृत मानव में अनन्यता सहित प्रत्यक्ष रहता है। ऐसी प्रेममयता के लिए मूलतः समझदारी, ईमानदारी,जिम्मेंदारी पूर्वक प्रमाणित होना पाया जाता है। इसे स्वयं में निरीक्षण परीक्षण करना ही नित्य निरंतर सार्थक अभ्यास है। जो पूर्णतः सामाजिक एवं व्यावहारिक है।
सामाजिकता एवं व्यावहारिकता में ही मानव की यथार्थता एवं वास्तविकता स्पष्ट होती है इसलिए प्रेम ही सुख, शांति, संतोष, आनंद का नित्य स्वरूप है। अस्तु, यही स्वर्ग है यही मुक्ति है। स्वर्गीयता का प्रत्यक्ष रूप ही अनन्यता है। परस्पर जागृत मानव में अनन्यता ही अखंडता है। मानव में अखंडता नैसर्गिकता संतुलन सहित स्वर्ग है। प्रेमानुभूति में ही सर्वोच्च प्रकार की सामाजिकता प्रकट होती है। सामाजिकता में ही स्वर्गानुभूति होती है। सामाजिकता, स्थापित मूल्यानुभूति एवं उसकी निरंतरता ही स्वर्ग, समाधान एवं सफलता है।
प्रेममयता की अनुभूति जीवन में जागृति पूर्णता है। यही पूर्ण प्रयोजन का प्रमाण है। आचरण पूर्णता ही जीवन का गंतव्य है। संज्ञानशीलता का यही लक्ष्य है। प्रेमानुभूति में ही अभाव और भाव की विषमताओं का तिरोभाव होता है।
व्यवहार आनुषांगिक ही स्थापित मूल्यों का अनुभव होना प्रसिद्ध है। अनुभव मूलक अभिव्यक्ति परम है इसी की अक्षुण्णता होती है। सम्पूर्ण मूल्यों को स्पष्ट किया जा चुका है। स्थापित मूल्यानुभूति क्षमता में प्रेमानुभूति होना स्वाभाविक है। ऐसी क्षमता का सर्वसुलभ होना ही लोकमंगल है।