वस्तुस्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य के रूप में जागृत जीवन मानसिकता में अक्षुण्ण रहता है। ऐसा प्रमाणित होने की स्थिति में प्रमाण नित्य वर्तमान ही है। इसलिए सबको अर्थात् सर्वमानव में, से, के लिए जीवन ज्ञान परम ज्ञान के रूप में संप्रेषित होता है। यही प्रामाणिकता पूर्ण जीवन मानसिकता का प्रमाण है। अस्तित्व दर्शन परम दर्शन के रूप में मानवीयता पूर्ण आचरण परम आचरण के रूप में सबके लिए जागृत जीवन मानसिकता संप्रेषित करता है। यह जागृति पूर्ण मानव परम्परा में समीचीन है। यह अनुभव मूलक विधि से प्रमाण परम्परा में सर्वसुलभ होना सहज है।

सहअस्तित्व में अनुभव ही परम तृप्ति, परम तृप्ति ही प्रामाणिकता, प्रामाणिकता ही प्रमाण, प्रमाण ही अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति ही संप्रेषणा, संप्रेषणा ही प्रकाशन, प्रकाशन ही कार्य व्यवहार, कार्य व्यवहार ही अभ्युदय, अभ्युदय ही निःश्रेयस, निःश्रेयस ही अनुभव है। अनुभव अक्षुण्ण है। जागृत मानव परम्परा में अनुभवगामी विधि से अध्ययन सहज वस्तु सहअस्तित्व सहज विधि से समीचीन रहता ही है। अध्ययन सहज सार्थकता अवधारणा के रूप में होना अथवा समझदारी के रूप में होना देखा गया है। अवधारणाओं का स्वरूप जानने-मानने के रूप में ही परखा गया है, समझा गया है। जानने-मानने का परम तृप्ति ही अनुभव स्पष्ट किया जा चुका है।

“स्थिति सत्य”, “वस्तु स्थिति सत्य”, “वस्तु गत सत्य” को जानना-मानना, अनुभव करना अस्तित्व दर्शन सूत्र है। कारण, गुण, गणितात्मक मानव भाषा को जानना-मानना, अनुभव करना यह मानवीयता पूर्ण संप्रेषणा सूत्र है। वास्तविकता, यथार्थता व सत्यता पूर्ण विधि से सम्पूर्ण कायिक, वाचिक, मानसिक व कृत-कारित-अनुमोदित कार्यक्रमों को परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था और प्रामाणिकता व स्वानुशासन रूपी कार्यक्रमों में जानना-मानना, अनुभव करना यह जागृति पूर्ण मानव परम्परा सूत्र है। निपुणता, कुशलता, पाण्डित्य पूर्ण शिक्षा- संस्कार सहजता को जानना-मानना और अनुभव करना यही मानवीय शिक्षा सूत्र है। जीवन सहज सम्पूर्ण क्रियाकलापों को जानना-मानना और अनुभव करना जीवन विद्या सूत्र है और मानवीयता पूर्ण व्यवहार, स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता का सम्मान, प्रतिभा व व्यक्तित्व में संतुलन को जानना-मानना व्यवहार सूत्र है। व्यवसाय, व्यवहार, विचार और अनुभव में सामरस्यता विधि को जानना-मानना, अनुभव करना यह मानव परिवार सूत्र है।

मानवीयता पूर्ण संस्कृति, सभ्यता, विधि व्यवस्था में सामरस्यता और परिवार, विश्व परिवार में सामरस्यता को, जानना-मानना और अनुभव करना अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था सूत्र है।

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