प्रभाव और प्रभाव क्षेत्र के रूप में भी मानव परम्परा में स्पष्ट हो पाता है। मानव परम्परा में सम्पूर्ण प्रयोजन व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के रूप में “परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था” ही है जिसका लक्षण समाधान, समृद्धि, अभय तथा सहअस्तित्व ही है। यही सर्व मानव स्वीकृति है। इसी लक्षण या फलन के अर्थ में व्यवस्था की सहज प्रतिष्ठा है। इन्हीं में श्रेष्ठता की पहचान हो पाती है। फलस्वरूप सम्मान कार्य सम्पन्न होता है। दूसरा प्रयोजन स्वानुशासन है यही स्वतंत्रता है। स्वतंत्रता में भी श्रेष्ठता का प्रयोजन लोकव्यापीकरण प्रयोजन के आधार पर मूल्यांकित होता है। इस प्रकार सम्मान कार्यकलाप सार्वभौमता के अर्थ में चरितार्थ होना पाया जाता है।
सार्वभौमता प्रत्येक ‘एक’ की स्थिति-गति है। यह संप्रेषणा, प्रकाशन, कार्य व्यवहार, स्वयं व्यवस्था और सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित होता है। मानव परम्परा में परस्परता का अनुभव होना ही मूल्यांकन कार्य प्रणाली का आधार है। जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने का तृप्ति बिंदु ही अनुभव के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार अनुभव एक व्यवहारिक एवं सार्वभौम अभिव्यक्ति के रूप में प्रमाणित होता है। इसे परीक्षण निरीक्षण सहित प्रमाणित करना भी संभव है (अथवा मानव सहज कार्य है)। इसकी संभावना के रूप में सामान्य विधि से यह पता लगता है कि प्रत्येक मानव व्यवस्था को वरता है (अथवा व्यवस्था में जीना चाहता है)। इस आशय की सार्वभौमता को अध्ययनगम्य कराना मानव परम्परा का ही प्रधान कार्य है। शिक्षा पूर्वक ही सम्पूर्ण अवधारणाएँ स्थापित हो पाती हैं। प्रचार, व्यवहार, व्यवस्था पूर्वक पुष्ट होते हैं। मानव अभी तक अपनी संचेतना के प्रति जागृत होने के क्रम में ही है। संभावनाएँ समीचीन हैं ही।
7. स्नेह 8. निष्ठा
स्नेह :- (1) न्यायपूर्ण व्यवहार में निर्विरोधिता (2) संतुष्टि में, से, के लिए स्वयं स्फूर्त मिलन और निरंतरता। (3) अभ्युदय में, से, के लिए स्वयं स्फूर्त उभय मिलन एवं उसकी निरंतरता।
निष्ठा :- जागृति पूर्ण लक्ष्य को निश्चित अवधारणा व स्मरण पूर्वक प्राप्त करने व प्रमाणित करने का निरंतर प्रयास।
मानव परम्परा में यह देखने को मिलता है कि मानव जाग्रति पूर्वक स्वयं स्फूर्त रूप में ही बहुत सारे क्रियाकलापों को करता है। नैसर्गिकता तथा वातावरण पहचानते हुए स्वयं को प्रमाणित करता है। उनमें जागृति सहजता से ही मानव सार्वभौम व्यवस्था अखंड समाज की भागीदारी में