मानते हैं, पहचानते हैं, निर्वाह करते हैं तब समाधानित होना पाया जाता है। तब संप्रेषणाएँ न्याय व समाधान के रूप में सार्थक होना पायी जाती है। जानने-मानने के साथ ही पहचानना, निर्वाह करना संपन्न हो जाता है। यही प्रमाण, यथार्थता एवं रहस्यमुक्ति (अरहस्यता) है।

मूल्यांकन के साथ अरहस्यता स्वाभाविक ही वर्तमान रहता है फलस्वरूप मूल्यांकन की संप्रेषणा, भाषा, मुद्रा, भंगिमा, अंगहार सहित संप्रेषित हो पाती हैं। इसीलिए सम्मान कार्य समारोह के रूप में सम्पन्न होता है। जागृति परम्परा में मानव सहज श्रेष्ठताएं बहुमुखी विधियों में सम्पन्न होना भावी है। मानवीयता पूर्ण परम्परा में अभिव्यक्ति में श्रेष्ठता व्यंजनीयता के आधार पर मूल्यांकित होती है।

व्यंजनीयता का तात्पर्य - साक्षात्कार होने से है साक्षात्कार चिंतन में होता है। व्यंजनाएं मानव मूल्य, जीवन मूल्य, स्थापित मूल्यों के प्रभाव के साथ, जीवन मूल्यों का बोध व अनुभव करने से है। सम्पूर्ण रसानुभूति का तात्पर्य है - जीवन मूल्य रूपी, सुख, शांति, संतोष, आनंद सहज आप्लावन जागृति सहज प्रमाणों के रूप में स्पष्ट होना। यही अनुभव करने और बोध कराने का तात्पर्य है।

ज्ञानावस्था में वैभवित मानव में मूल्य सहित रसास्वादन की अपेक्षा जीवन में है क्योंकि मूल्यांकन पूर्वक ही तृप्ति व उभय तृप्ति है। जागृति सहज अहर्ता जीवन सहज है। रसास्वादन स्रोत नित्य वर्तमान, सहअस्तित्व में ही समीचीन है। ऐसी रसास्वादन की अर्हता से अरहस्यता स्पष्ट होती है।

इससे स्वाभाविक ही सौजन्यता पूर्ण विधि से विचार शैली स्थापित हो पाती है। यह सब जीवन सहज पाँचों अक्षय बल और शक्ति का अविभाज्य वर्तमान है तथा सामरस्यता का द्योतक है। सामरस्यता अपने में संचेतना के स्वरूप में प्रमाणित होना ही है। परस्पर पूरकता ही सौजन्यता है।

मानव में संचेतना ही विशिष्ट वस्तु है जिसका प्रभावन कार्य ही जागृति के रूप में प्रमाणित होता है। जागृति पूर्वक ही मूल्यांकन कार्य सम्पन्न होता है। श्रेष्ठता के मूल्यांकन का एक ध्रुव मानव संचेतना है। मानव संचेतना सहज जागृति (यथा जानने- मानने, पहचानने, निर्वाह करने) में संगीत है जिसका प्रमाण जानने में, निर्वाह करने में, सामंजस्यता है (अथवा एक रूपता है)। दूसरा ध्रुव अस्तित्व सहज सहअस्तित्व में प्रयोजनों के साथ प्रमाणित होना ही है। यही जागृति

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