प्रवर्तित हो जाता है। इस प्रकार “स्वयं स्फूर्त होना” और ”प्रवर्तित होना” का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। ऐसी मौलिकता और प्रावधान मानव परम्परा में ही है। जीव संसार वंशानुषंगीयता और नैसर्गिकता के आधार पर अपने को व्यवस्था में पूरक प्रमाणित कर देता है। प्राणावस्था का बीजानुषंगी और नैसर्गिकता के आधार पर व्यवस्था में पूरक होना स्पष्ट हो चुका है। पदार्थावस्था ने परिणामानुषंगी विधि से अपने “त्व” सहित व्यवस्था को सहअस्तित्व में स्पष्ट कर दिया है।
मानव परम्परा में वंशानुषंगीयता के रूप में शरीर तथा संस्कारानुषंगीयता के रूप में जीवन जागृति है। मानव परम्परा रूपी वातावरण और नैसर्गिकता के योगफल में प्रत्येक मानव का प्रभावित रहना, प्रभावित करना होता है। फलस्वरूप सकारात्मक और नकारात्मक फल परिणामों को मूल्यांकन करना हो पाता है। इसका पुनर्प्रयास सकारात्मक पक्ष में स्फूर्त रहना, अन्यथा नकारात्मक पक्ष को समाधानित करने में प्रवृत्त रहेगा। ऐसा प्रवाह और तरंग मानव परम्परा में निरीक्षण- परीक्षण और सर्वेक्षण पूर्वक इतिहास में द्रष्टव्य है। इस प्रकार मानव सहज मौलिकता स्पष्ट है।
सम्पूर्ण स्वयं स्फूर्त विधि “जानने-मानने में तृप्ति” के अर्थ में; पहचानने-निर्वाह करने में; समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व रूपी प्रमाणों के अर्थ में स्वयं स्फूर्त होना पाया जाता है। ऐसे स्वयं स्फूर्त प्रभाव सहअस्तित्व सहज रूप में निश्चित योग-संयोग के लिए सूत्र निर्मित करते हैं। वातावरण में मानव तथा मानव निर्मित परिस्थितियाँ बनी ही रहती हैं। नैसर्गिकता सहज ही समीचीन रहती है। फलस्वरूप स्वयं स्फूर्त पहचान मानव के साथ होना स्वाभाविक हुआ। इसी प्रकार नैसर्गिकता के साथ भी संतुलन के अर्थ में स्वयं स्फूर्त पहचान हो पाती है। नैसर्गिकता में मानव के अतिरिक्त तीनों अवस्थाएँ गण्य हैं। मानव परम्परा ही वातावरण के रूप में मानव को उपलब्ध रहता ही है। सकारात्मक विधि से स्नेह की निरंतरता एवं वैभव प्रमाणित होता है। इस प्रकार स्नेह संबंध भी स्वयं स्फूर्त संबंध हैं। इसमें निहित आशय और प्रक्रिया भी स्पष्ट हो चुकी है। इसमें निरंतरता को बनाए रखना ही निष्ठा है। निष्ठापूर्वक ही सम्पूर्ण संबंध सफल हो पाते हैं। स्वयं स्फूर्त विधि ही संतुष्टि का आधार बिंदु है। इसीलिए उभय संतुष्टि है क्योंकि हर संबंध में एक से अधिक व्यक्तियों का होना पाया जाता है। इसलिए उभय संतुष्टि (अथवा जो जो संबंधित रहते हैं संतुष्टि क्रम में) स्नेह संबंध का निरंतर वैभवित होना पाया जाता है। सम्पूर्ण स्वयं स्फूर्तियाँ प्रत्येक व्यक्ति में व्यवस्था और उसकी सार्वभौमता के अर्थ में ही प्रवर्तित है जिसका व्यावहारिक फलन स्पष्ट रहता है। मानव-परम्परा में, से, के लिए सार्वभौम फलन समाधान, समृद्धि, अभय