अनुराग :- निर्भ्रमता में प्राप्त आप्लावन (अनुपम रसास्वादन संभावना की स्वीकृति)। आप्लावन अर्थात् सम्बंधों में निहित मूल्यों का निर्वाह करने में सफलता।

यह सर्वविदित है कि प्रत्येक मानव में किसी आयु के अनंतर संतान रूपी शरीर रचना के संबंध में सामान्य मान्यता की पहचान हो पाती है। मानव संतान के अवतरण के लिए एक मां और पिता की स्वीकृति सर्वसुलभ हो चुकी है (अथवा सर्व जनमानस में स्वीकृत हो चुकी है)। इस मुद्दे पर वैज्ञानिक चिंतन ने इसके विपरीत कुछ कर देने की इच्छा तो व्यक्त किया पर कर गुजरने की जगह में मानव की भाषा में जटिल और बहुत खर्चीले आशयों सहित एक सुयोग्य मानव के एक चमड़े के टुकड़े से ही लाखों अरबों मानव बनाने का दावा प्रस्तुत किया। आशय यही रहा कि अच्छे आदमी के चमड़े से अच्छे आदमी पैदा होंगे। इस मुद्दे पर ऐतिहासिक पराभव का कारण इन्हीं दावों के अंतर्निहित रहे आया क्योंकि अस्तित्व सहज सहअस्तित्व में रचना कार्यकलापों के अध्ययन से पता लगता है कि मानव शरीर भी भौतिक और रासायनिक रचना है। “जीवन” विकसित परमाणु, गठनपूर्ण परमाणु, जीवन पद में संक्रमित परमाणु है। जीवनी क्रम में गुजरता हुआ जीवन जागृति के अर्थ में मानव शरीर के माध्यम से अभिव्यक्त होता हुआ जानने-मानने, पहचानने के क्रम में है। मानव शरीर रचना की महिमा जीवन प्रदत्त जीवन्तता सहित सम्पूर्ण संवेदनाओं को (पाँच ज्ञानेन्द्रिय एवं पाँच कर्मेन्द्रियों) व्यक्त करने के रूप में, जीवनआकाँक्षा के अनुसार संचालित हो सके ऐसे वैभव के अवसर में ही जीवन जागृत होने का प्रावधान, संभावना, जीवन सहज आवश्यकता ये तीनों मानव परम्परा में अध्ययनगम्य हैं। इस विधि से जीवन ही शरीर को संचालित करने वाला सहअस्तित्व सहज कार्यकलाप है।

वैज्ञानिक दावों और अभीप्सा ने, जीवन तत्व को पूर्णतया ओझिल, अनसुनी और अनदेखी किया। हठधर्मितावश धरती और नैसर्गिकता के साथ जो कुछ भी कर सकते थे वह सभी हविश पूरा कर चुके। सभी ओर पराभव की काली दीवाल आ गई है या आने ही वाली है। यह भी तथ्य उजागर हो चुका है कि जिन नियमों, सिद्धांतों को विज्ञान कहते हैं उन विधियों से जीवन तत्व का विश्लेषण हुए हैं उन सबसे अधिक हर मानव दिखता ही है। इसका मूल तत्व जीवन सहज वैभव के रूप में सभी व्यक्तियों में देखने को मिलने वाली कल्पना शीलता मात्र है। इससे पता लगता है कि विज्ञान से जो कुछ भी कहा जाता है उससे अधिक विचार, विश्लेषण, परिकल्पना, कल्पना होती ही है। जो कुछ भी किया जाता है उससे अधिक तो होता ही है। इस प्रकार मानव

Page 48 of 205
44 45 46 47 48 49 50 51 52