सहज कल्पनाशीलता को विधिवत अध्ययन करने के लिए प्रयत्न होता तो अभी मानव जैसा विविध समस्याओं से जकड़ा है इस दुर्गति की स्थिति नहीं आती।
पुत्र-पुत्री संबंध की धारक-वाहकता जागृत माता-पिता में होना, सहज है। इन जागृति के मूल में अभ्युदय आकाँक्षा सभी में रहती है। इसीलिए माता पिता संतान के लिए अभिभावक होते हैं। अभ्युदय की कामना, कल्पना योजना में अभिभूत रहने की स्थिति और गति जिनमें हो = अभिभावक। ऐसी स्थिति में परिभाषा में कहे गए सभी स्वीकृत सूत्र अभ्युदय के लिए आवश्यक होते हैं यह भी स्पष्ट है। अभ्युदय का स्वरूप सार्वभौम तत्व है।
नियति सहज अभीप्सा है। जो अस्तित्व में है वही मानव में होता है। इसी विधि से अभिभावक की संतान के प्रति अभ्युदय कामना किसी शिक्षा संस्कार, व्यवस्था के बिना भी कल्पना के रूप में स्वीकृत रहते आया है। इस तथ्य को देखने पर पता चलता है कि अस्तित्व में अभ्युदय सूत्र और व्याख्या है ही। फलस्वरूप अस्तित्व में मानव अभ्युदय, प्रामाणिकता के लिए प्रयोजित होना ही मानव कुल का प्रयोजन है। उक्त विधि से विश्लेषण से, मानसिकता से, मान्यताओं से यह पता लगता है कि मान्यता के रूप में भी मानव शुभ चाहता ही है। मान्यता ही अभ्युदय का आधार और अभ्युदय मानवीयता पूर्ण मानसिकता का आधार है, प्रयासोदय समझदारी सहज जागृत परम्परा में संक्रमित होने के क्रम में है।
ऐसा शुभ मानस सम्पन्न मानव व्यर्थताओं से, अवांछनीयताओं से, अस्वीकृत दबावों से ग्रसित क्यों रहा है ? इसका उत्तर यही मिलता है कि परंपराएँ सड़ चुकी हैं अथवा भ्रमित मान्यताओं से परम्परा ग्रसित हो चुकीं हैं। फलतः प्रत्येक शुभ मानस सम्पन्न संतान परम्परागत भ्रमवादी प्रभावों से प्रभावित हो जाती है। इसके साक्ष्यों को देखें, जैसे (1) प्रत्येक संतान किसी अभिभावक की गोद में ही होती है यह सबको विदित है। अभिभावकों में (अथवा सर्वाधिक अभिभावकों में) उनकी परिभाषा में कहे हुए सभी आशय सार्थक नहीं हो पाते जबकि होना चाहिए। न हो पाना किसी अभिभावक को स्वीकृत नहीं है। (2) दूसरी विधि में प्रत्येक मानव संतान किसी न किसी शिक्षा-शिक्षण संस्थान में अर्पित होती है वे संस्थान अभ्युदय पूर्ण शिक्षा और शिक्षण पूर्ण संस्कार विधियों से अनभिज्ञ रहते हैं।
दूसरी भाषा में इस धरती पर जितनी भी शिक्षण संस्थाएं विगत से आज तक हुई है उनमें मानवाभ्युदय सम्पन्नता और उसकी सार्वभौमता प्रमाणित नहीं हो पाई। फलतः विद्यार्थी के लिए यही शेष रह जाता है कि जो शिक्षा शिक्षण संस्थान अभी तक जो कुछ भी प्रावधानित कर पाए