हैं उसे ही पढ़ें। इससे यही हो पाया जैसा कि अभी सम्पूर्ण मानव दिख रहे हैं, देख रहे हैं, कर रहे हैं, करा रहे हैं, झेल रहे हैं, झेलने के लिए बाध्य कर रहे हैं। इसका एक वाक्य में सार है - समस्याओं का विपुलीकरण होना। आरंभिक समय से अभी तक समस्याएँ अधिक होते ही आई हैं किन्तु समस्यायें कभी स्वीकार नहीं हो पायी।
उक्त प्रकार से पता लगता है कि मानवीयता पूर्ण परम्परा स्थापित होने के लिए आप हम प्रयत्नशील हैं। इसकी सफलता के लिए “मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान” प्रस्तुत है। सम्पूर्ण अभ्युदय के लिए मानव परम्परा में अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण सम्पन्न होना अनिवार्यता है। इसी क्रम में परिवार व्यवस्था परम्परा, ग्राम परिवार, विश्व परिवार परम्परा और व्यवस्था क्रम में ही अभ्युदय का निश्चयन, प्रावधान, प्रभावन सहज समीचीन है। फलस्वरूप मानव कुल पुत्र-पुत्री संबंधों को विधिवत निर्वाह करता हुआ सफलता का अनुभव कर सकेगा। आज भी जो विरले लोग आंशिक रूप में सफलता का अनुमान कर रहे होंगे वे भी परिभाषा में कहे हुए आशय को पूरा करने की स्थिति में ही संतुष्ट हो पाएंगे।
11. स्वामी (साथी) 12. दायित्व
स्वामी (साथी) :- (1) सर्वतोमुखी समाधान प्राप्त व्यक्ति। ऐसे व्यक्ति का ही किसी और व्यक्ति के अभ्युदय के लिए साथी होना संभव है। अभ्युदय ही सर्वजन आकाँक्षा है। इसे सफल बनाना मानव परम्परा है। इसमें (अर्थात् अभ्युदय में) पारंगत व्यक्ति दूसरों को अभ्युदयशील, अभ्युदयपूर्ण प्रमाणित करने के क्रम में साथी (स्वामी) का पद पाता है। (2) “स्वयं ईक्षयतेति सा स्वामी” स्वयं स्फूर्त विधि से दृष्टा पद में हो। ” इच्छयेते इति सा स्वामी“। स्वयं को जो पहचान चुका है, जान चुका है, मान चुका है वे निर्वाह करने के क्रम में साथी (स्वामी) कहलाते हैं।
दायित्व :- परस्पर व्यवहार, व्यवसाय एवं व्यवस्थात्मक सम्बंधों में निहित मूल्यानुभूति सहित शिष्टता पूर्ण निर्वाह।
साथी (स्वामी) एक नामकरण है जिसकी सार्थकता परिभाषा में ही इंगति हो चुकी है। अस्तित्व ही सहअस्तित्व है यह विदित हो चुका है। इसी क्रम में संबंधों को पहचानना निर्वाह करना, जानना- मानना संभव है और यह प्रमाणित होता है। श्रेष्ठता का गुणानुवादन सुनकर श्रेष्ठता के लिए साथी (स्वामी) का वर्णन मानव सहज संभावना है। साथी (स्वामी) शब्द के साथ ही