अपेक्षाएँ, श्रेष्ठता एवं शुभ के वांछित स्रोत के रूप में ही भास-आभास हो पाता है। ऐसे साथी (स्वामी) अभ्युदय के अर्थ में- समाधान, समृद्धि, अभय एवं सहअस्तित्व के सफल होने के लिए दिशादर्शन करते हैं। सहयोगियों में स्वयं स्फूर्त होने के लिए पूरक विधि से प्रमाणित हो पाते हैं। जागृति सूत्र विधि से प्रत्येक व्यक्ति में सर्वतोमुखी समाधान सहज अभ्युदय को प्रमाण रूप में विधि विहित प्रक्रियाओं से पारंगत बनाना साथी (स्वामी) का ही दायित्व है।
अभ्युदय ही सर्वशुभ होने के कारण सभी संबंधों में सूत्र प्रभावित रहते हैं यह स्वाभाविक है। सेवक अथवा सहयोगी साथी का प्रयोजन जागृति और सर्वतोमुखी समाधान ही होता है। इसमें साथी (स्वामी) और सहयोगी (सेवक) के आशय समान होने के कारण पूरकता ही स्वामी का काम है। पूरकता को स्वीकारना ही सेवक (सहयोगी) का कार्य बन जाता है। पूरक विधि से ही सहअस्तित्व वैभवित है। इसी क्रम में मानव का एक मात्र मार्ग है सहअस्तित्व क्रम में प्रत्येक मानव किसी न किसी के लिए पूरक होता ही है और किसी न किसी से पूरकता पाता ही है। ऐसी पूरकता वश जागृत होना प्रत्येक व्यक्ति में, से, के लिए अवश्य ही सफल होने का मार्ग प्रशस्त होता है।
13. सेवक (सहयोगी) 14. कर्तव्य
सहयोगी :- पूर्णता अथवा अभ्युदय के अर्थ में मार्गदर्शक अथवा प्रेरक के साथ-साथ अनुगमन करना, स्वीकार पूर्वक गतित होना।
कर्तव्य :- (1) प्रत्येक स्तर में प्राप्त सम्बंधों एवं सम्पर्कों और उनमें निहित मूल्यों का निर्वाह। (2) जिस कार्य को करने के लिए स्वीकार किए रहते हैं उसे करने में निष्ठा को बनाए रखना।
प्रत्येक व्यक्ति किसी का सहयोगी या किसी का साथी है ही। सम्पूर्ण मूल्यों और सम्बंधों का निर्वाह स्वयं स्फूर्त सेवा है। इस तथ्य के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति का परस्परता में संबंध व मूल्यों का निर्वाह करना ही कर्तव्य है। इसी विधि से प्रत्येक व्यक्ति किसी के लिए साथी है, किसी के लिए सहयोगी है। इस प्रकार दायित्व और कर्तव्य सहज निर्वाह ही सेवा है। यही मूल्यों का आस्वादन भी है। दायित्व के रूप में साथी (स्वामी) कर्तव्य के रूप में सहयोगी (सेवक) का स्वरूप स्पष्ट है। दायित्व का व्यवहार कार्य रूप स्वयं स्फूर्त विधि से होना पाया जाता है। हर कार्य व्यवहार लक्ष्य सहित संबंध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय-तृप्ति,संतुलन, नियंत्रण के रूप में सार्थक होना पाया जाता है। कर्तव्य के रूप में सेवा को पूर्ण कर पाना सहयोगी के संतोष का