स्रोत है। इस कर्तव्य में निष्ठा का पालन हो यही सहयोगी के लिये प्राप्त मार्गदर्शन की सफलता है। मानवीय सम्बंधों व मूल्यों की पहचान व निर्वाह के रूप में सेवा है। स्वयं स्फूर्त होने तक के लिए मार्गदर्शन पाना आवश्यक है, स्वयं स्फूर्त होना कर्तव्य निष्ठा का द्योतक है। सम्पूर्ण सेवाओं में उसका स्वतः स्फूर्त होना व मार्गदर्शन की आवश्यकता उसके अंतः बाह्य कर्तव्यों में सहज गति के रूप में होना पाया जाता है।

सामाजिक संबंध (अर्थात् मानव सम्बंधों) के आधार पर व्यवसाय संबंध सफल होने की व्यवस्था है। केवल व्यवसाय संबंध के आधार पर मानव संबंध एवं मूल्यों की पहचान नहीं हो पाती। व्यवसाय संबंध के लिए रासायनिक भौतिक वस्तुयें हैं जो मूलतः प्राकृतिक अथवा रूपात्मक अस्तित्व में, से निश्चित अवस्था के रूप में वर्तमान है। उस पर श्रम नियोजन पूर्वक उत्पादित वस्तुओं में उपयोगिता अथवा कला मूल्य को स्थापित किया जाता है। वर्तमान तक लाभोन्मादी मानसिकता के आधार पर सम्पूर्ण व्यवसाय के निर्भर होने के फल स्वरूप यह विफल होते आया। अस्तित्व में लाभ से इंगित वस्तु नहीं हैं और न ही उस भय और प्रलोभन की सत्ता है। अस्तित्व में सम्पूर्ण व्यवस्था नियम निरंतर, नियम प्रवर्तन, नियम नियंत्रण, नियम न्याय संतुलन, मूल्यों का निर्वाह और मूल्यांकन के रूप में सार्वभौम है।

इसी के साथ पूरकता विधि क्रम में उदात्तीकरण, विकास, जागृति देखने को मिलती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सभी समुदाय परंपराएँ भ्रमवश ही लाभ, प्रलोभन तथा भय के दलदल में फंस गई हैं। इसका समाधान मूल्यों पर आधारित मूल्यांकन है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन है; संग्रह के स्थान पर आवर्तनशील अर्थव्यवस्था है; सुविधा, भोग, अतिभोग के स्थान पर उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनीयता है। इस आधार पर साथी सहयोगियों का कर्तव्य व दायित्व व्यवहृत होना ही है जो समीचीन है।

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