15. स्वायत्त 16. समृद्धि
स्वायत्त :- समृद्धि का अनुभव ही स्वायत्त है।
समृद्धि :- आवश्यकता से अधिक उत्पादन।
आवश्यकता से अधिक होने के बिन्दु में ही तृप्ति का अनुभव होना पाया गया है। इसे हर व्यक्ति अपने में जाँच सकता है। ऐसा जाँचने के क्रम में इस तथ्य का भी मूल्यांकन होता है कि हम आवश्यकता से अधिक उत्पादन किये है या नहीं। आवश्यकता से अधिक उत्पादन परिवार की सीमा में ही मूल्यांकित होता है। परिवार में सभी संबंधों का सम्बोधन जागृत मानव प्रकृति को जाँचने के लिए एक आवश्यकता है।
इस विधि से सोचा जाय तो पता लगता है कि 10 व्यक्तियों के बीच में सीमित संयत संतानों के साथ सर्वाधिक संबंधों का सम्बोधन परिवार में सुलभ हो जाता है फलस्वरूप हर के साथ कर्तव्य और दायित्व स्फुर्त होना पाया जाता है। स्वयं स्फुर्ति सदा-सदा जागृति के आधार पर सम्पन्न होना पाया गया। जागृति समझदारी के अर्थ में सार्थक है। इस प्रकार समझदार मानव ही संबंध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति करने में सक्षम है। इसकी आवश्यकता हर मानव में रहती ही है। इसे सार्थक रूप देना मानव परम्परा का अभीष्ट है। जागृति सर्वमानव को स्वीकृत है, इस विधि से समझदारी, लोक व्यापीकरण होने का स्रोत मानव परम्परा में ही है उसमे भी शिक्षा-संस्कार विधा ही प्रबल प्रभावी स्रोत है।
समृद्धि :- आवश्यकता से अधिक उत्पादन का अर्थ समृद्धि है।
लाभ की परिकल्पना भ्रमवश, प्रलोभनवश लाभ प्रवृत्तियां, शोषणपूर्वक संग्रह सुविधा के रूप में होना स्पष्ट हो चुकी है। लाभाकाँक्षा भ्रमित मानव को अच्छी लगती है, इसका अच्छा होना संग्रह सुविधा के आधार पर देखा गया। लाभ के साथ संग्रह की अनिवार्यता, दूसरे क्रम में भोग की पिपासा होना पाया जाता है। इन दोनों विधियों से मानव तो बर्बाद होता ही है। बर्बाद होने का तात्पर्य अतृप्ति की तादात का बढ़ना है क्योंकि संग्रह का तृप्ति बिंदु नहीं है। इसी के साथ-साथ संघर्ष और युद्ध एक अनिवार्य स्थिति बनती है। इसकी गवाहियां पूरी हो चुकी हैं। इसी के साथ नैसर्गिकता में तमाम प्रदूषण फैलाना भी साक्षित हो चुका है। इस प्रकार नैसर्गिकता की बर्बादी देखने को मिलती है। इस स्थिति में भी सुखी व समाधानित होने की अपेक्षा बनी ही रहती है।