अभी तक के आर्थिक इतिहास के आधार पर उल्लेखनीय यही रहा है कि संग्रहरत व्यक्ति, परिवार एवं देश को बड़ा या विकसित कहते आ रहे हैं। प्रलोभन का ही प्रभाव शोषण के रूप में होना पाया जाता है। इनके दुष्परिणामों को सामाजिकता के सार्थक रूप में देखना नहीं बन पाया। यही सम्पूर्ण लाभोन्मादी सम्मोहन का प्रभाव रहा है। यहाँ उल्लेखनीय तथ्य यही है कि संग्रह के साथ भी, संग्रह करते हुए भी भोग, युद्ध, व्यसन में रत रहते हुए भी समृद्धि की कामना बनी ही रहती है। यही जीवन सहज, नियति सहज प्रवर्तन का साक्ष्य है। समुदाय परंपरावश ही मानव जीवन सहज या नियति सहज तथ्यों को पहचानने में असमर्थ रहा है। शुभ निरंतर समीचीन रहा ही है।

उक्त क्रम में समृद्धि के साथ अभय तथा समाधानापेक्षा प्रत्येक मानव में देखने को मिलती है। प्रत्येक मानव जीवन के रूप में अक्षय बल, अक्षय शक्ति सम्पन्न है। शरीर के रूप में सीमित बल व शक्ति के रूप में है। साथ ही मानव शरीर व जीवन का संयुक्त साकार रूप है। इसी सत्यतावश भौतिक रासायनिक वस्तुयें शरीर की आवश्यकता हैं। उत्पादन क्रम में जीवन शक्तियाँ शरीर द्वारा नियोजित होती हैं, फलतः शरीर द्वारा आवश्यकता से अधिक उत्पादन होना मानव सहज है। यही उत्पादन सुलभता है। यह विनियम सुलभता व न्याय सुलभता पूर्वक उपयोगिता, सदुपयोगिता व प्रयोजनीयता सहित समृद्धि, समाधान, अभय, सहअस्तित्व सहज स्वराज्य व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी सम्पन्न होता है। प्रत्येक व्यक्ति का उत्पादक होना अथवा उत्पादन कार्य में भागीदार होना मानव सहज आयाम है। निश्चित उत्पादन और लाभ-हानि मुक्त विनिमय प्रणाली ही उसके संतुलन को स्पष्ट करती है।

स्वराज्य व्यवस्था के प्रधान आयाम पाँच हैं :-

(1) न्याय सुलभता (2) उत्पादन सुलभता (3) विनिमय सुलभता (4) स्वास्थ्य-संयम सुलभता (5) शिक्षा-संस्कार सुलभता।

प्रथम तीनों के स्रोत के रूप में मानवीयतापूर्ण शिक्षा संस्कार सुलभता और स्वास्थ्य संयम सुलभताएँ समाविष्ट रहती ही हैं। यही मानव परम्परा की विवेक व विज्ञान पूर्ण गति व संगति है। प्रत्येक मानव व्यवस्था को ही वरता है। व्यवस्था में, से, के लिए समृद्धि सहज है। अस्तु स्वयं में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के वैभव क्रम में ही उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनीयता प्रमाणित होती है। साथ ही आवश्यकता से अधिक उत्पादन से, शोषण विहीन विनियम से तथा न्याय सुलभता से वर्तमान में विश्वास होता है।

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