मानव परम्परा में स्वस्थ मानव का प्रकाशन मनःस्वस्थता अर्थात् जीवन तृप्ति सर्वतोमुखी समाधान व व्यवस्था में प्रमाण पूर्वक मनाकार को साकार करने के रूप में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। ऐसी कार्य संपन्नता के लिए अनुकूल माध्यम रूपी शरीर ही स्वस्थ शरीर है। इस प्रकार स्वस्थ शरीर की अवधारणा स्पष्ट है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन कार्य में उपयोगी मानव संबंधों एवं नैसर्गिक संबंधों, उनमें निहित मूल्य निर्वाह करने योग्य शरीर स्वस्थ शरीर है। अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण सहज अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन के लिए सुगम माध्यम होना स्वस्थता का द्योतक है। ऐसी कसौटियों से खरी उतरने वाली स्थिति को उज्जवल बनाए रखना सहज रूप में हित दृष्टि व हित कार्य है।
19. प्रिय 20. प्रवृत्तियां
प्रिय :- शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धात्मक ज्ञानेद्रियों के लिए शरीर स्वस्थता के अर्थ में अनुकूल योग-संयोग।
योग :- नैसर्गिक रूप में प्राप्त मिलन।
संयोग :- पूर्णता एवं उसकी निरंतरता के अर्थ में मानवीय संबंध रूपी प्राप्त मिलन।
संवेग :- पूर्णता में, से, के लिए किया गया बौद्धिक, जागृत जीवन सहज प्रामाणिकता पूर्ण संकल्प, इच्छा, विचार, आशा प्रमाणीकरण प्रक्रिया।
प्रवृत्तियाँ :- (1) उपलब्धि एवं प्रयोजन सिद्धि हेतु प्रयुक्त बौद्धिक संवेग। (2) परावर्तन होने के पहले, जीवन में होने वाली, आशा, विचार, इच्छा, संकल्पों एवं प्रामाणिकता की स्थिति व्यवहार के अर्थ में मानवीयता पूर्ण मानसिकता।
प्रिय :- इंद्रियों के योग-संयोग वश स्वीकृत संकेत सापेक्ष प्रवृत्ति और मानसिकता होना पाया जाता है। इंद्रियों का कार्यकलाप जीवन अनुग्रह रूपी जीवंतता पूर्वक संपादित होता है। सभी मानव जीवन्त रहते ही इंन्द्रिय सन्निकर्षात्मक कार्य करते हैं। अर्थात् इंद्रिय गोचर होने वाले सभी क्रियाकलापों को विषय नाम दिया गया है। ऐसा विषय विषयापेक्षा सहित शरीर को ही जीवन मान लेने की स्थिति में जीवन की महिमा सहज कार्य-कलापों, प्रयोजनों को पाना संभव नहीं हो पाया। इसी कारण मानव चाहता कुछ है, करता कुछ है और होता कुछ है।