इंद्रिय जीवन्त रहने के फलस्वरूप ही सन्निकर्षात्मक क्रिया है (अर्थात् इन्द्रियों का संयोग होने के उपरान्त, संयोग के अर्थ को साक्षात्कार करने की क्रिया से है)। ऐसे सन्निकर्ष में आए वस्तुओं के योग-संयोग से सुख-दुख भासते हुए देखा जाता है। जिसमें सुख भासता भी है उसकी निरंतरता को सन्निकर्षात्मक विधि से पाना संभव नहीं हुआ, प्रमाणित नहीं हुआ। इसी सत्यतावश इंद्रियों के आधार पर किया गया नाप-तौल और निर्णय, वांङ्गमय और कार्यकलाप जो प्रस्तुत किया गया, वे सभी योजनाएं असामाजिक होना पाई गईं। इस प्रकार शरीर पर आधारित जितनी भी अभिव्यक्तियाँ हुई, उनसे सार्वभौम व्यवस्था, समाज न्याय, अखंड समाज, सर्वतोमुखी समाधान सहज परम्परा को पाना संभव नहीं हुआ। इसलिए बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक समुदाय चेतना ने, साथ ही अंतर विरोध और परस्पर समुदायों के बीच युद्ध और युद्ध की तैयारियों ने मानव को विवश कर रखा। जबकि सबसे प्रिय सुख, सुन्दर, समाधान, समृद्धि इनमें सामरस्यता का कार्यकलाप भी मानव परम्परा के लिए व्यावहारिक प्रवृत्ति का आधार है यह मानव सहज अस्तित्व में पाया जाता है।
यह सुस्पष्ट है कि सुन्दर के साथ सुख, सुख के साथ समाधान, समाधान के साथ सुन्दरता की खोज अथवा परीक्षण-निरीक्षण-सर्वेक्षण क्रियाओं को मानव ने संपादित किया है। मानव सहज संचेतना (अर्थात् संवेदनशीलता, संज्ञानशीलता) पर विश्वास किया है। मानव के लिए आहार, विहार, व्यवहार और व्यवस्था में भागीदारी के रूप में ही व्यक्तित्वात्मक सौंदर्य मूल्यांकित, प्रमाणित होता है। यही मानव परम्परा में, से, के लिये अनुभव करना नियति सहज प्रस्तुति है। व्यक्तित्व की परिभाषा यही है। व्यक्तित्व ही सौंदर्य का आधार हो पाता है, दूसरी कोई वस्तु नहीं हो पाती। इसी विधि से सौंदर्य का मूल्यांकन करना संभव है। क्योंकि व्यक्तित्व का मूल्यांकन होता है। यह सर्व विदित तथ्य है कि सौंदर्य के साथ सुख, ऐसे सुख के साथ समाधान समृद्धि; समाधान समृद्धि के साथ व्यक्तित्व; व्यक्तित्व के साथ नित्य सौंदर्य अनुभूति है। (अथवा परम्परा सहज सौंदर्य अनुभूति है)
प्रतिभा सहित व्यक्तित्व में स्वाभाविक रूप में सर्वतोमुखी समाधान समाज न्याय, परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन में भागीदारी, स्वास्थ्य संयम में जागृति, मानवीय शिक्षा संस्कार सम्पन्न व्यक्ति ही व्यवहार में सामाजिक तथा व्यवसाय में स्वावलम्बी होता है। वह अपने आहार-विहार, व्यवहार में स्वास्थ्य-संयम का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यही सम्पूर्ण सौंदर्य का आधार बनता है। ऐसे व्यक्तित्व रूपी सौंदर्य अनुभूति के आधार पर ही मानवीयता पूर्ण पद्धति,