प्रणाली, नीति पूर्ण अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र और व्याख्या स्वाभाविक रूप में सम्पन्न होती है। अस्तित्व सहज रूप में नियति क्रम विधि से अपने मानवत्व सहित मानव स्वयं में व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के लिए प्रेरित है और प्रेरक है। यह प्रत्येक मानव की जीवन सहज प्यास है। इसे परीक्षण, निरीक्षण, सर्वेक्षण पूर्वक आंकलित किया जा सकता है। यह सब जीवन और शरीर के संयुक्त अध्ययन का फलन है। इस प्रकार प्रिय लगने वाली प्रवृत्तियांमान व सहित व्यवस्था के अर्थ में हैं। मान्यताओं और प्रवृत्तियों के आधार पर सदा-सदा के लिए सबसे प्रिय व्यक्तित्व, सुन्दर, सुख और समाधान के रूप में सबको सुलभ हो सकता है। मानव मानसिकता का तथा विधि सहज मानसिकता का (अथवा नियति सहज मान्यता का) फलन हर व्यक्ति के लिए समीचीन है।

21. उल्लास 22. हास

उल्लास :- मुखरण। उत्थान की ओर पारदर्शक प्रस्तुति और गति।

हास :- समाधान सहित प्रसन्नता व मुस्कान सहित मानवीय लक्ष्य व दिशा की ओर गति।

उल्लास हास क्रम से उत्सव और मुस्कान के अर्थ में प्रकाशित होता है। ये दोनों पूरक हैं। उत्सव उत्थान की ओर अर्थात् मानव लक्ष्य व दिशा में गति से है यही हासोल्लास का सहज प्रमाण है। प्रमाण का प्रकाशन है। जबकि हास, हँसी और उत्सव का प्रकाशन है। दोनों का अपने आप सहज होना स्पष्ट है। उत्सव तभी मानव में उमड़ता है जब मानव में जागृति व उसकी निरंतरता क्रम में मानवीयता “स्वत्व” के रूप में प्रमाणित हो जाय। तब हंसी उसके अनुरूप में मुस्कान के रूप में प्रमाणित होती है। इस प्रकार हास हँसी के रूप में और उल्लास मानवीयता में जागृति है। देव मानवीयता, दिव्य मानवीयता का प्रकाशन सहज उल्लास अग्रिम जागृति और जागृति की निरंतरता के रूप में सार्थक होता है।

मन मान्यताओं के आधार पर कार्यशील रहता है। मान्यताएँ शरीर व्यापार के साथ होना ही भ्रम का कारण है। यह शरीर का अधिमूल्यन है जीवन का अवमूल्यन है। भ्रमित मानसिकता में की जाने वाली सभी क्रियाएँ सर्वथा अव्यवहारिक होती हैं। मानव सभी आयामों, दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्य में व्यक्त होता है। निर्भ्रम अवस्था, जागृत अवस्था में मानव जितनी भी विद्याओं में कार्यकलापों को सम्पन्न करेगा वह सब न्यायिक, समाधानित, प्रामाणिकता सम्पन्न रहता ही है। निर्भ्रम आधार पर मानव समाधान, न्याय, समृद्धि तथा सहअस्तित्व सम्पन्न होता है। उत्थान की

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