ओर गतिशीलता के अर्थ में उल्लास उत्सव के रूप में बना रहता है। उसके आधार पर मानव का सम्पूर्ण लक्ष्य सफल होता है। मानवीयता पूर्ण मानव का लक्षण न्यूनतम रूप में परिवार में प्रमाणित होता है सम्पूर्ण समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित होता है क्योंकि परिवार ही मानव समाज और व्यवस्था का न्यूनतम ध्रुव है तथा समग्र व्यवस्था ही अधिकतम ध्रुव है। परिवार, समाज अखंड है और व्यवस्था सार्वभौम है। परिवार अखंड होने के आधार पर ही विश्व परिवार के रूप में समाज और उसकी अखंडता प्रमाणित होती है।
परिवार की अखंडता ही विश्व परिवार की अखंडता का आधार है। परिवार में अन्तर्विरोध ही परिवार विघटन है। यह भ्रमवश व्यक्तिवादी प्रवृत्ति के कारण होना पाया जाता है। परिणामतः अखण्ड समाज का कल्पना ही नहीं हो पाती है। सभी छोटा परिवार एवं सयुंक्त परिवार दोनों ही व्यक्तिवादवश के वाद-विवाद में रह गये हैं। भोग लिप्सा, व्यसन के लिये छोटे परिवार को अनुकूल माना गया है। परिवार खंडित होने के उपरान्त परिवार नहीं रह पाता है। अकेले एक मानव के आधार पर परिवार का प्रमाण नहीं हो पाता। इसी प्रकार विघटित परिवार अथवा मानव समाज के रूप में नहीं होता। परिवार व समाज का विघटन मानव कुल का अभिशाप है। इससे मुक्त होने के लिए मानव में मानवीयता ही एक मात्र विधि है।
मानव व्यवहार, कर्म, अभ्यास एवं अनुभव परम्परा में ही मानव के उत्साहित रहने से हँसी-खुशी के साथ नित्य सफलता समीचीन रहती है। भ्रमवश ही विघटित परिवार और समाज आवेशों को उत्साह मानता हैं। यह भय व प्रलोभन का रूप है। भय-प्रलोभन मानव का भ्रमवश लिया गया निर्णय है। यह मानव कुल के लिए अव्यवहारिकता का कारण हुआ। अन्य अव्यवहारिकताएं द्रोह-विद्रोह, शोषण, युद्ध में देखने को मिलती हैं। यह मानव कुल में आवेश का साक्ष्य है। जबकि समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व सर्वमानव का स्वत्व एवं स्वभाव गति है। इसकी संभावनाएँ यथार्थता के आधार पर स्पष्ट होती हैं। इस प्रकार हास-उल्लास का आधार मानवीयतापूर्ण व्यवहार, आचरण, व्यवस्था में भागीदारी के अर्थ में उत्सवित है और हर मानव को हर मानव का जागृति सहित कर्तव्यों, दायित्वों के अर्थ में उत्सवित करना ही उल्लास व हास का वास्तविक अर्थ में प्रयोजन, सार्थकता, नित्य आवश्यकता है।