23. शील 24. संकोच

शील :- जागृति सहज वैभव को शिष्टता के रूप में सभी आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्य में प्रमाणिकता को इंगित कर लेना और कराने की क्रिया का नाम शील है। शिष्टता पूर्ण लक्षण। शिष्टता अर्थात् पूर्ण जागृत मानव के द्वारा जागृति के अर्थ में किया गया अभिव्यक्ति, संप्रेषणा व प्रकाशन।

संकोच :- अस्वीकृति को शिष्टता से प्रस्तुत करना।

मानव में आदि काल से ही परस्पर शिष्टता की अपेक्षा बनी ही रही। इसकी अभिव्यक्ति में, संप्रेषणा में, उत्पादन में, व्यवहार में, प्रकाशन में, व्यवस्था में अच्छे होने की अपेक्षा रही जो सफल न हो पाया। युद्ध में, द्यूत (जुआ-खेलने) में, कला-कविता में और इसी के साथ व्यापार में भी मानव शिष्टता की अपेक्षा करते आया। मूलतः आशित इन मुद्दों पर शिष्टता का अच्छा लगने के रूप में अपेक्षाएँ रही जो ध्रुवीकरण न होने से शिष्टता का लक्षण भी अनिश्चयता के चंगुल में आया अतः व्यक्ति केन्द्रित रूप में शिष्टता की बात टिक गई। जिससे जैसा बना वह उसकी शिष्टता बनती गई। इस प्रकार राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक शिष्टताएं, शिक्षा सुलभ, व्यवहार सुलभ, व्यवस्था सुलभ नहीं हो पाईं।

मानव संचेतना सहज विधि से किए गये सम्पूर्ण अध्ययन के फलस्वरूप शिष्टता का स्वरूप नाम और कार्य के रूप में - सूची रूप में प्रस्तुत है :-

नाम

कार्य

(1) सौम्यता -

स्वेच्छा से स्वयं स्फूर्त विधि से स्वयं की नियंत्रण क्रिया।

(2) सरलता -

ग्रंथि व तनाव रहित अंगहार, क्रियाकलाप।

(3) पूज्यता -

गुणात्मक विकास, जागृति सहज स्वीकृति सहित किए गए क्रियाकलाप।

(4) अनन्यता -

मानव की परस्परता में पूरक क्रियाकलाप। (एकात्मता) प्रामाणिकता व समाधान में निरंतरता। अविकसित के विकास में सहायक क्रिया।

(5) सौजन्यता -

सहकारिता, सहयोगिता, सहभागिता सहज क्रियाकलाप।

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