(6) सहजता -

(1) स्पष्टता एवं प्रामाणिकता पूर्ण क्रियाकलाप।

(2) आंडबर तथा रहस्यता से मुक्त व्यवहार, रीति, विचार एवं अनुभव की एक सूत्रता क्रिया।

(7) उदारता -

(1) स्व प्रसन्नता पूर्वक कार्य।

(2) दूसरों के उत्थान के लिए आवश्यकतानुसार तन, मन, धन रूपी अर्थ का अर्पण, समर्पण क्रिया।

(8) अरहस्यता -

जिस प्रकार से स्वीकृत है उस अवधारणा स्मृति अथवा श्रुति को यथावत प्रस्तुत करने का क्रियाकलाप।

(9) निष्ठा -

लक्ष्य को स्मरण पूर्वक प्राप्त करने का निरंतर प्रयास।

उपरोक्त चित्रित शिष्टता के स्वरूप में मानव स्वयं परीक्षण कर सकता है। हम जितना भी किए हैं सब में यही उत्तर निकलता है। ये क्रियाएँ सभी व्यक्ति कर सकते हैं और मैं भी करता ही हूं। इन शिष्टता पूर्ण क्रियाओं को करते समय जो लक्षण एक दूसरे को दिखाई पड़ते हैं वह सब शिष्टता के अर्थ में ही स्वीकार होता है। ये सब नाम दिए गए हैं। ये सब लक्षणों सहित नाम हैं। शिष्टता का ध्रुवीकरण मूल्यों के आधार पर ही होता है। मूल्यों को अनुभव सहित जीने वाला प्रत्येक मानव शिष्टता पूर्ण विधि से प्रस्तुत करता है। फलस्वरूप मूल्यों का प्रमाणीकरण मूल्यांकन हो जाता है।

मूल्य-मूल्यांकन, सम्बंधों के साथ मूल्यों की अनुभूतिपूर्वक ही मूल्यांकन होना पाया जाता है। इसी शिष्टतापूर्ण पद्धति से अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, लोकव्यापीकरण होना सहज है। मानव परम्परा में इसकी नित्य संभावना समीचीन है। इसीलिए सम्बंधों के आधार पर मूल्य और मूल्यांकन क्रियाकलाप मानव सहज क्रिया है क्योंकि मानव में, से, के लिए इसकी आवश्यकता बनी हुई है। इन्हीं आधारों पर प्रकारान्तर से इसकी तलाश भी रही है। मानव परम्परा में इस सम्पदा का “स्वत्व” सहज रूप में अधिकार न होने और स्वतंत्रता के रूप में प्रमाणित न होने के फलस्वरूप सुदूर विगत से अब तक मानव का ही “स्वत्व”, मानव में ही “स्वत्व”, मानव से ही “स्तत्व” को जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने से मानव वंचित रहते आया।

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